केदार

दैनिक जीवने बहवः घटना भवन्ति ये जीवनस्य प्रवाहं बाधितुं, तस्मिन् परिवर्तन कर्तुं शक्ताः सन्ति। पौराणिक भाषायाम् अयं बाधनं दारण शब्देन सूचीक्रियते। अयं कदाचिदपि भवति यत् कोपि घटना अस्मभ्यं हेतु स्थायी परिवर्तनकारी भवति। सर्वेपि जीवन व्यापाराः किंचिदपि परिवर्तनं कर्तुं अशक्ता भवन्ति। यदि वयं किमपि दुःखस्य दर्शनं कुर्वामः, अस्य प्रभावः क्षणिकं एव भवति। केवलं गौतम बुद्ध सृदश जनेभ्यः एव तत् स्थायी परिवर्तनस्य कारणं भवति। यदि कोपि विचारकः, ज्ञानी अस्ति,तदा मिष्टान्नस्य आस्वादनं कृत्वा सः विचारयिष्यति यत् अयं रसः न मर्त्यात्मक स्तरस्य रसः अस्ति, अयं दैविक स्तरस्य रसः प्रतीयते। केदार शब्दस्य संदर्भे, के जल अर्थे अस्ति ये जलाः जडीभूताः सन्ति, तेषां दारणं, द्रवणं केदारः भविष्यति। स्कन्द  पुराण ६.१२२ कथानुसारेण शिवः शक्रं पृच्छति – त्वया हेतु के दारयामि। शक्रः उत्तरं ददाति – मम हेतु हिरण्याक्षं तस्य चतुर्भिः सचिवैः सह दारय। शिवः एवमेव करोति। अतः तस्य संज्ञा केदारेश्वरः भवति। अत्र हिरण्याक्षः पृथिव्योपरि प्रचलितं द्यूत प्रकृत्याः प्रतीकमस्ति। हिरण्याक्षस्य बृहद् रूपं हिरण्याश्वः भविष्यति। पुराणेषु केदारस्य बृहद्रूपस्य प्रतीकं महिषः अस्ति। यावत् काले दुःखस्य अथवा सुखस्य अनुभवं स्थानिकं एव वर्तते, तावत्काले अयं द्यूत रूप एव भविष्यति। यदा दुःखस्य अनुभवं धारा भविष्यति, तदा अयं हिरण्याश्वः अथवा महिषः भविष्यति। पुराणकथानुसारेण केदारे शिवस्य वासः महिष रूपे एव भवति। तस्य महिषस्य शिरः नयपाले(नेपाले) भवति, पुच्छं केदारे।

पुराणेषु सार्वत्रिक रूपेण ( उदाहरणरूपेण, मत्स्य १३.३०, स्कन्द ५.३.१९८.६७) कथनं भवति यत् पुराण केदारे मार्गदायिनी देव्याः वासं भवति। अयं मार्गदायिनी देवी कः भवति। यदा वयं संशयस्य स्थित्यां भवामः, तदा अयं मार्गदायिनी देवी आवां हेतु निर्णय – सहायक संकेताः प्रदास्यति। वामन १६.३५/३७.३५ अनुसारेण केदारक्षेत्रे सरस्वत्याः स्थितिः सुवेणु नाम द्वारा अस्ति।अयं संकेतः यत् केदार स्थित्यां आकाश वाक् सुवेणु भवति, सा वाक् भविष्य विषये आवश्यक निर्देशान् ददाति।

     पुराणेषु केदारस्य स्वरूपं वृन्दायाः पिता रूपे अपि अस्ति। वृन्दा कन्या उपरि डा. लक्ष्मीनारायण धूतस्य चिरप्रतिष्ठित टिप्पणी द्रष्टव्यः अस्ति।

     अयं प्रतीयते यत् जलानां दारणं, के – दारणं सोमयागस्य कृत्ये दीक्षान्तर्गतं भवति। दीक्षा पश्चात् आरुणकेतुकं कृत्यं सम्पादनीयं भवति। आरुणकेतुके विभिन्न जलानां संग्रहणं अपेक्षितं अस्ति। ते जलाः इष्टकाः, कामनापूर्तिकर्तृकाः भवन्ति। तेषां संग्रहणकाले मन्त्रस्य पदं भवति – तया देवतया अंगिरस्वद् ध्रुवा सीद। अस्मिन् संदर्भे आरुणकेतुकं चयनोपरि टिप्पणी द्रष्टव्यः।


KEDAARA/KEDARA

 Kedaara is one of the most famous pilgrimage center in India where a Hindu devotee goes to worship lord Shiva who is the presiding deity of this place. Let us try to understand the esoteric aspect of kedaara on the basis of sacred puraanic and vedic texts. There can be several interpretations of word kedaara. One interpretation given in Shabdakalpadrum is that ke- is head and daara is the wife of lord Shiva, Gangaa( One upanishada states the position of sacred Kedaara place in the head).  Shiva bears Gangaa in his hair locks on the head. The other interpretation can be that ke is this individuality, lower part of our consciousness and daara is connected with tearing apart. So, any event which can tear apart our lower self, is kedaara. One of these events can be any thrilling experience. Some people get this thrilling experience when they hear some devotional music, somebody gets this experience when one is visiting some holy place, someone gets when a holy soul gives his touch etc. What happens when one gets thrilling experience? Some kind of electricity is generated in our body and some liquid in our head which was lying collected there and unused, spreads throughout the body. Some people are not able to recover from this experience for a very long time.

          Let us try to seek vedic origin of word kedaara and that can help understand the contents of Kedaara section of Skanda Puraana. Word kedaara does not appear in vedic literature. Khe, instead of ke appears there. Ke is taken as lower self, while Khe may be connected with higher self. Khe or Kham is called sky, an empty place. Vedic mantras talk of tearing apart of Khe of water, after which water starts flowing. How this tearing is done in vedic literature, it becomes evident from sacrificial procedures. In Somayaga, Ukthaas are recited to awaken sleeping praanic forces. As such, it is very difficult to understand the vedic contexts of tearing apart of Khe of water unless one takes clues from puraanic literature.

          Kedaara section of Skanda puraana talks of so many different types of characteristics of lord Shiva in the form of 100 types of lingas which is the famous Shatarudriya. This section also talks of a linga surrounded by a circle or Pindi which is taken as symbolic of nature. Coverage of linga and surrounding circle can be understood on the basis of vedic mantras which talk of a central hole in the wheel of the chariot. The axis of the chariot is fixed in this hole and when the chariot moves, this axis is said to constantly absorb energy from the hole and vice versa . This symbolism can be understood on the basis of  the principle of modern electricity where the flow of electricity in a coil can generate energy in a rod placed at its center or vice versa. Therefore, according to this presentation, supreme power and nature both are giving and taking energy from each other. But in all likelihood, only nature receives the energy from supreme power.

          Kedaara section of Skanda puraana also covers the preservation of semen of lord Shiva by different beings like Agni, Gangaa, Krittikaa etc and subsequently the birth of Kumaara. It seems that the tearing apart of the treasure of divine water is not enough. Means have to be applied to preserve this water also. Then the word kedaara will be ke-dhaara.

          Kedaara section also talks of a person of mean caste who steals the musical bell in a shiva temple. This story may be symbolic of getting thrilling experience through music.

 

केदार

टिप्पणी वैदिक साहित्य में 'के' शब्द की अपेक्षा 'खे' शब्द प्रकट हुआ है । अथर्ववेद १०.२.६ में शीर्ष के चक्षु, श्रोत्र आदि ७ खानि ( खम् का बहुवचन ) या छिद्रों का उल्लेख आता है । ऋग्वेद ८.९१.७ में रथ, अनः तथा युग के खे ( सप्तमी विभक्ति, अर्थात् खम् में ) का उल्लेख है । ऋग्वेद ८.७७.३ से प्रतीत होता है कि खम् का अर्थ रथ की नाभि है जिसमें रथ का धुरा पिरा रहता है । खम् से रथ के पहिए या चक्र के अरे जुडे रहते हैं । ऋग्वेद ७.८२.३ में आपः के खानि को ओज द्वारा तोडा गया है । ऋग्वेद ५.३२.१ में उत्स के दरण से खानि के सृजन का उल्लेख है । पौराणिक साहित्य में केदार शब्द के महत्त्व से हमें यह सोचना पडेगा कि क्या वैदिक साहित्य में खम् के साथ दारण, विदारण शब्द का प्रयोग किया गया है? ऋग्वेद ४.२८.१ में खानि के अपावरण तथा ऋग्वेद ७.८२.३ में आपः  के खानि का ओज द्वारा तृन्दन करने का उल्लेख है । अब केदार शब्द के दूसरे भाग दार - दारण, विदारण पर विचार करते हैं । ऋग्वेद १.६१.५, १.६३.७, १.१३०.१०, १.१७४.२, ३.४५.२, ६.२०.३, ६.२०.१०, ७.५.३, ८.९८.६, १०.४६.५ में पुर का अथवा ७ शारदी पुरों का दरण इन्द्र द्वारा अथवा अग्नि द्वारा करने का उल्लेख है । पुरों के दरण से प्रतीत होता है कि पुरों में जो आपः संगृहीत है, उसका मोचन होता है ( ऋग्वेद ३.४५.२ ) । ऋग्वेद ४.१.१४ तथा ४.१६.८ में अद्रि के दारण से मार्जन, शुद्धि होने तथा आपः के मोचन का उल्लेख है । ऋग्वेद ६.६६.८ में व्रज के दारण का उल्लेख है । ऋग्वेद १.१२९.८ में दुर्मतियों के दारण का तथा ऋग्वेद १.५३.४ में इन्दुओं द्वारा दस्यु के दारण का उल्लेख है । ऋग्वेद १.१३२.६ में शत्रुओं के दारण का उल्लेख है । ऋग्वेद ६.२७.४ में स्वन (शब्द ) से परम के दारण का उल्लेख है । ऋग्वेद १.१३०.१० में पुरों के दारण का कार्य उक्थों द्वारा किया जाता है । यज्ञ के अन्त में उक्थों का गान किया जाता है जिससे अनुमान है कि सोए हुए प्राण सक्रिय हो जाते हैं ( द्र. उक्थ पर टिप्पणी ) । इस वैदिक आधार पर स्कन्द पुराण की केदार संहिता में वर्णित सामग्री की व्याख्या का प्रयास किया जा सकता है । रथ में उसके चक्र की नाभि में, खम् में रथ का धुरा पिरा रहता है जो खम् का सतत् दारण करता रहता है । अन्य शब्दों में, धुरे की ऊर्जा को चक्र का खम् सतत् अवशोषित करता रहता है । स्कन्द पुराण में इसी आधार पर लिङ्ग और उसके परितः पिण्डी की कल्पना की गई है । पिण्डी लिङ्ग की ऊर्जा का लगातार अवशोषण करती रहती है । स्कन्द पुराण के अनुसार शिव के लिङ्ग के पृथिवी पर पतन पर सारे देवता लिङ्ग के परितः पिण्डी बन गए । दूसरे शब्दों में पिण्डी प्रकृति का, पार्वती का रूप है । इसे ही स्त्री - पुरुष के मिथुन की संज्ञा दी गई है । केदार की वास्तविक स्थिति को रोमाञ्च की स्थिति से समझा जा सकता है जिसमें सारा व्यक्तित्त्व हिल जाता है । पौराणिक व वैदिक साहित्य इस घटना को इस प्रकार प्रकट करता है कि रोमाञ्च से व्यक्तित्व के सातों पुर हिल जाने चाहिएं , उनमें जमी हुई शक्ति धारा के रूप में बहकर निकलनी चाहिए । और रोमाञ्च किस प्रकार उत्पन्न हो? वैदिक साहित्य में तो रोमाञ्च उद्दीपन के साधनों में उक्थ ( ऋग्वेद १.१३०.१०), इन्दु ( ऋग्वेद १.५३.४), स्वन या नाद ( ऋग्वेद ६.२७.४), वृषभ ( ऋग्वेद १०.९९.११), ओज ( ऋग्वेद ७.८२.३) के उल्लेख हैं । लेकिन स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि जब देवताओं ने शतरुद्रिय का पाठ किया, तभी इन्द्र वृत्र की कुक्षि के विदारण में समर्थ हो सका । स्कन्द पुराण १.२.१३ में शतरुद्रिय दिया गया है जिसमें १०० प्रकार के  शिव लिङ्गों को बनाने का उल्लेख आता है । अतः रोमाञ्च को उत्पन्न करने के लिए कम से कम १०० विशिष्ट तरीके हैं ।

          केदार क्षेत्र जल से आप्लावित क्षेत्र को कहते हैं । महाभारत आदि पर्व में शिष्य आरुणि द्वारा केदार कुल्या के बहते जल की रक्षा के प्रयत्न की कथा सर्वविदित है । यास्क के निरुक्त १०.८ में इन्द्र शब्द के निर्वचन के संदर्भ में इरां दारयति, इरां धारयति, दोनों ही अर्थ किये गए हैं । ऐसा प्रतीत  होता है कि जहां दारण कर्म होता है, वहां दारण के पश्चात् धारण की भी आवश्यकता पडती है । ऋग्वेद १०.६९.३ में अग्नि द्वारा वाज के दारण और श्रव के धारण का उल्लेख है । स्कन्द पुराण केदार संहिता में शिव के वीर्य को अग्नि, जल, कृत्तिका आदि धारण करते हैं जिससे कुमार का जन्म होता है । अतः कुमार की उत्पत्ति का पूरा आख्यान केदार संहिता के अनुरूप ही हो सकता है । केदार संहिता में किरात द्वारा शिवलिङ्ग पर आरूढ होकर घण्टा चुराने की कथा है जो नाद द्वारा दारण का प्रतीक हो सकती है ।

          केदार संहिता में शिवलिङ्ग और उसके परितः पिण्डी की कल्पना आधुनिक भौतिक विज्ञान की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है । यदि किसी तार के माध्यम से विद्युत का प्रवाह किया जाता है तो उस तार के परितः यदि एक तार की कुण्डली रखी जाए तो बीच के तार की विद्युत का आंशिक ग्रहण परितःस्थित कुण्डली में किया जा सकता है । इसके विपरीत, यदि परितः स्थित कुण्डली में विद्युत प्रवाह किया जाए तो मध्य में स्थित तार द्वारा विद्युत का ग्रहण करना कठिन होता है । प्रकाशीय ऊर्जा के दृष्टिकोण से, प्रकाश की किरण जब भौतिक द्रव्य के माध्यम से पारण करती है तो वह भौतिक द्रव्य के कणों से टकराकर उनका उद्दीपन करती है ।

          जाबाल दर्शनोपनिषद ४.४८ में केदार पीठ की स्थिति को ललाट में कहा जाना महत्त्वपूर्ण है । शब्दकल्पद्रुम में के का अर्थ शीर्ष और दार का अर्थ दारा, अर्थात् शिव के शीर्ष में स्थित गङ्गा रूपी दारा, पत्नी किया गया है ।

          पाणिनीय उणादि सूत्र भोजवृत्ति २.३.४५ में केदार शब्द की निरुक्ति कदि धातु ( रोदने तथा आह्लादने ) के आधार पर की गई है । यह निरुक्ति कितनी सत्य है, यह उपरोक्त विवेचन के आधार पर निर्णय किया जा सकता है ।

          ऐसा अनुमान है कि खम् आकाश से सम्बन्धित है जबकि कम् पृथिवी से । अतः वेदों के खे और पुराणों के के का अन्तर स्पष्ट समझने की आवश्यकता है ।

 

प्रथम प्रकाशित २००५ई.(विक्रम संवत् २०६२)

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