In Hindu tradition, it is essential to remove kesha/body hair before any ritual. Ray of light is also called a kesha. Vedic texts indicate that in spiritual path, loss of extra energy has to be minimized at any cost and sun rays or light from fire etc. are considered as loss of energy. Cutting  with a scissor is one way to get rid of body hair. But vedic texts take this task in esoteric aspect. There are hymns in vedas where for shaving purposes, scissor is created by one god, hot water is provided by another, shaving is done by another. The other way seems to be that hair should not be allowed to grow at all and if the inner system of collective energy shows any sign of emission of rays, then these rays have to be moved back and forth by so many processes suggested in vedic texts. Out of these, we are familiar with some processes in modern sciences.

There is another aspect of hair in puraanic  texts. This is that the herbs on the earth have been called as similar to hair on the body. In Somayaga, a kind of grass is spread on the earth and this may be said to be symbolic of loma/body hair. These body hair may be taken to be symbolic of thrilling experience, because body hair are said to be activated due to some thrilling experience. In Somayaaga, there are two kinds of grass to be spread on the earth. Out of these two, one is prastara which is symbolic of tuft of hair on the head(shikha) which Hindus leave unshaved while shaving. The other is barhi/ordinary hair. These have to be removed while shaving. This indicates that if one experiences any thrill, he has to concentrate it to it’s highest level, brahmrandhra. This type of hair is used as a broom to clean the head and other parts in Somayaaga.

          While shaving of hair is prescribed for men, growing hair is prescribed for women. The reason may be that a woman is considered as symbolic of nature and nature is supposed to magnify itself with sunrays.

Keshava is one of the famous names of lord Vishnu or Krishna in Hindu mythology. Mahaabhaarata interprets the word as one who has got radiation properties at all the three levels - fire, moon and sun. Vedic texts indicate that keshava is one whose radiative property has stopped. He has become an enunch like lead metal.

    It seems that until one has not learned how to check his outgoing radiation, his outgoing waste energy, he should not try to become universal, to serve others. Rather it is desirable that he be self centered.Keshee is the state where energy is being wasted through radiation.And then demon keshi assumes the form of a horse. According to Dr. Fatah Singh, horse in mythology is symbolic of spreading oneself outwardly, for the benefit of society. But sacred texts indicate that this form will be demonical. The opposite of ashva/horse is aksha/axis. Aksha can be understood with the help of examples of modern sciences. In a magnetic axis, all magnetic energy flows through it's axis. The only energy coming and going out is through it's poles. Similar should be the position of a devotee also.Krishna kills demon Keshee by putting his arm in his mouth. In vedic word book, arm/baahu/gabhasti in singular form has been classified under synonyms for arm, while in plural forms, these may fall under synonyms for rays etc. This indicates that putting his arm inside the mouth of demon Keshee somehow signifies channelizing the radiating energy of the demon. In vedic texts, there is reference of one Keshee Daarbhya, or Keshee who can become inward. Dribhi root means to knot oneself.

केश

टिप्पणी ऋग्वेद १.१६४.४४ में तीन केशियों का उल्लेख है जिसकी व्याख्या में कहा गया है कि अग्नि, वायु और आदित्य तीन केशी, अर्थात् केशयुक्त हैं । अग्नि की ज्वालाओं को उसके केश माना जाता है । सूर्य की रश्मियां उसके केश हैं । सूर्य आदि से रश्मियों के निकलने से सूर्य की ऊर्जा की हानि होती है । अतः यह अपेक्षित है कि इस हानि को रोका जाए । इसी तथ्य को केशवपन नाम दिया गया है । चौल संस्कार आवश्यक संस्कारों में से एक है जिसमें केशवपन के लिए अथर्ववेद ६.६८ सूक्त का विनियोग किया जाता है । केशवपन का कार्य अदिति करती है ( आश्वलायन गृह्य सूत्र १.१७.७ ), सविता तेज रूपी क्षुर / उस्तरा प्रदान करता है, वायु उष्ण उदक प्रदान करती है आदि ।  तैत्तिरीय ब्राह्मण १.५.५.१ में चातुर्मास यज्ञ हेतु दीक्षा से पूर्व केशवपन की विधि व मन्त्र दिए गए हैं । इसके अनुसार अग्नि एक घर्म का रूप है और उस घर्म का केशों के माध्यम से क्षरण रोकने के लिए  ऋत्, सत्य, तप, शिव व शग्म द्वारा उसका निवर्तन, परिवर्तन, अनुवर्तन, उपवर्तन व अभिवर्तन करना होता है । सूर्य रश्मियों के परावर्तन से तो हम आधुनिक विज्ञान के माध्यम से परिचित हैं ( दर्पण से सूर्य रश्मियों का परावर्तन होता है ), लेकिन अभिवर्तन, निवर्तन आदि किन प्रक्रियाओं की ओर संकेत करते हैं , यह अन्वेषणीय है । वर्तन का अर्थ इस प्रकार समझ सकते हैं कि यदि प्रकाश को एक गोले के अन्दर उत्पन्न किया जाए तो गोले की परिधि से टकराकर प्रकाश उसी गोले में आगे - पीछे चलता रहता है, बाहर नहीं निकल पाता । शुक्ल यजुर्वेद २५.३ के अनुसार मशक / मच्छर रूपी क्षुद्र प्राणों की तृप्ति केशों से होती है । शतपथ ५.५.४.२० में प्राणों में लोमों को स्थान दिया गया है । पुराणों में केशों को पाप का स्थान कहा गया है जो ऊर्जा की हानि की दृष्टि से उचित है । लेकिन आपस्तम्ब श्रौत सूत्र ६.२०.२ में केशों को बर्हि तथा शिखा को प्रस्तर कहा गया है । यज्ञ में वेदी को कुशा घास की बनी झाडू से साफú किया जाता है जिसे वेद कहते हैं । यज्ञ में मस्तिष्क के प्रतीक पुरोडाश को भी वेद से झाडा जाता है ( मैत्रायणी संहिता १.४.८, ४.१.९ आदि ) । यहां वेद पुरोडाश रूपी मस्तिष्क पर केशों का प्रतीक है । इसका अर्थ ऐसा प्रतीत होता है कि अग्नि, सूर्य आदि की जो रश्मियां पृथिवी पर पडती हैं, उनसे पृथिवी पर ओषधियां, वनस्पतियां आदि उत्पन्न होती हैं । पृथिवी पर उत्पन्न यह ओषधियां ऐसे ही हैं जैसे हमारे शरीर पर लोम । यज्ञ में वेदी पर बर्हि बिछाने  का कार्य भी पृथिवी द्वारा ग्रहण की गई शक्ति का प्रतीक हो सकता है । सूर्य आदि की रश्मियों से प्राणों को मिलने वाले अनन्द को , रोमांच को बर्हि कह सकते हैं । जब यह आनन्द तीव्र होकर ब्रह्मरन्ध| तक में प्रवेश कर जाए तो यह बर्हि के बदले शिखा का, प्रस्तर का ( आपस्तम्ब श्रौत सूत्र ६.२०.२) रूप धारण कर सकता है । केशवपन में केशों का वपन अपेक्षित है, शिखा का नहीं । शतपथ १२.९.१.६ में उपस्थ लोमों को वृक लोम, उर व निकक्ष के लोमों को व्याघ्र लोम तथा केश व  श्मश्रु को सिंह लोम कहा गया है । यह कथन प्राणों को प्राप्त होने वाले उच्चतर और उच्चतर आनन्द की ओर संकेत करता है । जैमिनीय ब्राह्मण २.६२ व ३.३५८ में दीक्षित रूपी सूर्य की अर्वाङ्ग रश्मियों को श्मश्रु तथा ऊर्ध्व रश्मियों को केश कहा गया है ।

          अथर्ववेद १४.१.५५ में सूर्या के विवाह में बृहस्पति द्वारा केशों के कल्पन का उल्लेख है । अथर्ववेद १४.२.६८ में कृत्रिम कण्टक / कंघी द्वारा केशों के मल को निकालने का उल्लेख है । कण्टक रोमाञ्च का प्रतीक है । आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १८.१५.६ में केशवपन के समय नमुचि के शिर का निरसन करने का उल्लेख है । नमुचि का अर्थ भी न छूटने वाला हर्ष लिया जाता है । पौराणिक साहित्य में जहां पुरुष के लिए केशवपन का निर्देश है, वहीं स्त्री के लिए केशवर्धन का । यह स्त्री  प्रकृति का, पृथिवी का प्रतीक हो सकती है जो सूर्य की रश्मियों रूपी केशों को ग्रहण करती है ।

          केश शब्द की निरुक्ति उणादि कोश ५.३३ में क्लिश धातु से ल के लोप के रूप में की गई है । यह धातु दुःख उठाने, क्लेश के अर्थ में है । निहितार्थ अन्वेषणीय है ।

          पुराणों में भोजन में केश मिश्रित होने पर भोजन के अपवित्र होने के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण २.२.४.५ में केशमिश्रित आहुति से अभिराधन न होने का उल्लेख है । इसका निहितार्थ यह हो सकता है कि जिस भोजन को ग्रहण करने से शक्ति का संचय न होता हो, शक्ति केशों के रूप में क्षरित होती हो, वह भोजन अपवित्र है ।

          एक ओर चेतना से रहित केश आदि के वपन का निर्देश है तो दूसरी ओर केश को वेद कहा गया है । महानारायणोपनिषद २५.१ के अनुसार शिखा वेद है ।

प्रथम प्रकाशन २००५ई.(विक्रम संवत् २०६२)

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