Puraanic Subject Index पुराण विषय अनुक्रमणिका



कुश

वाल्मीकिरामायणे आख्यानमस्ति यत् वाल्मीकिः पर्यंके सीता-पुत्रं लवं न पश्यति, अतएव भयत्रस्तः सः कुशेभ्यः एकं पुत्तलिकां रचयति एवं अस्मिन् पुत्तलिकायां प्राणसंचारं करोति। तत् रामस्य द्वितीयः पुत्रः कुशः भवति। वैदिकवाङ्मये मुञ्जप्रलवस्य उल्लेखं प्रकटयति यस्य प्रज्वलनं अपेक्षितं भवति। मुञ्जविषये सार्वत्रिककथनमस्ति यत् यथा मुञ्जतः इषीकां पृथक्कुर्वन्ति, एवमेव देहतः आत्मनः पृथक्करणं अपेक्षणीयमस्ति। कालस्य अवयवविशेषस्य संज्ञा अपि लवः अस्ति। वर्तमान संदर्भे लवस्य तात्पर्यं लौ, अग्नेः ज्वाला प्रतीयते।

कुशविषये द्वितीयः चक्षुरुन्मीलकः तथ्यः अयमस्ति यत् या द्वारकापुरी अस्ति, पुराकाले सा कुशस्थली आसीत्। तत् स्थलः राजा रैवतस्य तपःस्थलः आसीत्। अन्ये आख्याने कथनमस्ति यत् कृष्णः द्वारकानगर्याः सृजनाय समुद्रतः स्थलस्य अपेक्षां करोति एवं समुद्रः यथापेक्षितं करोति। कालान्तरे, यदा कृष्णः देहत्यागं करोति, तदा समुद्रः द्वारकायाः जलाप्लावनं करोति। अस्मिन् संदर्भे, शतपथब्राह्मणस्य अयं कथनं सार्थकं अस्ति यत् देवानां सम्मार्जनं द्वयेन भवति – ब्रह्मणा, अद्भिश्च। वायुपुराणानुसारेण द्वारकायाः स्थितिः कण्ठमध्ये अस्ति। कण्ठे विशुद्धिचक्रः भवति। रजनीशमहोदयः कथयति (कुण्डली और सात शरीर ) यत् विशुद्धि चक्रे चेतना देहपाशं त्यक्त्वा बाह्यजगते अन्येषु चेतनासु प्रविशतुं शक्नोति। अतएव, द्वारकाशब्दः सार्थकः अस्ति। सार्वत्रिककथनमस्ति यत् अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या। किन्तु नवद्वारा शब्दस्य व्याख्या न विद्यते। अयमपि संभवमस्ति यत् प्रेम्णः वर्धनं हृदये, वृन्दावने भवति, किन्तु तस्य अभिव्यक्तिः विशुद्धिचक्रे एव भवति।

कृष्णस्य देहत्यागानन्तरं द्वारकायाः आप्लावनं शतपथब्राह्मण १.३.१.३ कथनस्य व्याख्याने समर्थः अस्ति। कथनानुसारेण, देवानां सम्मार्जनं द्वयेन भवति – ब्रह्मणा, अद्भिश्च। मनुष्यस्य एकेन – अद्भिः। हरिवंशपुराणे ३.३७.३ अस्य कथनस्य रूपमयं अस्ति - जातमात्रोऽथ भगवान्स कुशैर्ब्राह्मणैर्धृतः ।। तदाप्रभृति देवेशः कौशिकत्वमुपागतः ।। अपां (पुण्य-पापानां) स्रोतं कुशः अस्ति। लौकिककर्मकाण्डे, कुशाग्रतः निर्गतेन अपसा पापानां प्रक्षालनं भवति। वैदिककर्मकाण्डे, यः कुशमूलः अस्ति, तेन पात्रस्य बाह्यभागस्य मार्जनं भवति। यः कुशाग्रः अस्ति, तेन पात्रस्य अन्तरस्य (आत्मनः अन्तरस्य – तैसं. ७.२.१०.४ ) मार्जनं भवति।

पुराणेषु एकः कुशप्लवः तीर्थः अस्ति यस्य संक्षिप्तमाहात्म्यं एव उपलभ्यते। किन्तु कुशप्लवे या अन्तर्निहिता भावना अस्ति, तत् चिन्तनीया अस्ति। प्लवः अर्थात् नौका। किं कुशः स्वयमेव प्लवः भवितुं शक्यते, न ज्ञातम्। अन्या संभावना अस्ति यत् कुशः प्लवनक्रियायां सहायकः भवति। आधुनिकचिकित्साविज्ञाने, मस्तिष्कः प्रमस्तिष्कीय द्रवे (सेरेब्रोस्पाइनल फ्लुइड) प्लावनं करोति, येन कारणेन मस्तिष्कस्य यः वास्तविकभारः अस्ति, तत् न प्रतीयते, अपितु अल्पभारः एव प्रतीयते। यदि केनापि कारणेन प्रमस्तिष्कीय द्रवस्य मात्रा न्यूना भवति, तदा मस्तिष्कस्य प्लवनं बाधितं भवति। अयं प्रतीयते यत् प्लवनस्य घटना मस्तिष्कं यावत् सीमिता नास्ति। अपितु यः शिरोभागः अस्ति, तत् अपि कण्ठतः निर्गतस्य कस्मिंश्चित् द्रवोपरि प्लवनं करोति। यदि देहस्य अन्यानि अंगानि कुशः भवितुं शक्यन्ते, तदा तत्रापि प्लवनं भविष्यति।

पुराणेषु सार्वत्रिकरूपेण उल्लेखः अस्ति यत् विष्णुः कुशः अस्ति, लक्ष्मी इध्मा। कर्मकाण्डे अयं इध्माबर्हिषः रूपेण प्रकटयति।

ऋग्वेदे कुशशब्दः न विद्यते, अपितु कोशः, कशा आदयः सन्ति। किं कोशः कुशस्य रूपमस्ति, अन्वेषणीयः।

 ( ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी, विक्रम संवत् २०८१, 14-6-2024ई.)

टिप्पणी : शतपथ ब्राह्मण १.३.१.३ का कथन है (द्वयेनैव देवेभ्यो निर्णेनिजत्येकेन मनुष्येभ्योऽद्भिश्च ब्रह्मणा च देवेभ्य आपो हि कुशा ब्रह्म यजुरेकेनैव मनुष्येभ्योऽद्भिरेवैवम्वेतन्नाना भवति) कि पात्र सम्मार्जन/प्रक्षालन देवों के लिए दो प्रकार से किया जाता है जबकि मनुष्यों के लिए एक प्रकार से। देवों के लिए आपः से तथा ब्रह्म से पात्र का सम्मार्जन किया जाता है जबकि मनुष्यों के लिए केवल आपः से। और यज्ञ कर्मकाण्ड में आपः का कार्य कुशा से लिया जाता है तथा ब्रह्म का यजु से। इस कथन में ब्रह्म से सम्मार्जन से क्या तात्पर्य हो सकता है, इसका और आगे स्पष्टीकरण श्री गोवान तथा ब्रह्माण्ड पुराण १.१.५.६१ (विपर्यायेण शक्त्या च बुद्ध्या सिद्ध्या तथैव च ।स्थावरेषु विपर्यासस्तिर्यग्योनिषु शक्तितः ॥) के आधार पर किया जा सकता है। श्री गोवान का मत है कि सृष्टि से पहले यह जगत सममित था। सृष्टि होने के पश्चात् जड पदार्थ की सममिति का बहुत सा अंश नष्ट हो गया। लेकिन सममिति कभी नष्ट नहीं होती। अतः वह विद्युत् आवेश आदि के रूप में जड पदार्थ पर अभी भी विद्यमान है। ब्रह्माण्ड पुराण इससे भी आगे गया है और बताया है कि सृष्टि करते समय ब्रह्मा ने स्थावर या जड पदार्थ में विपर्यास के रूप में प्रवेश किया, तिर्यकों में शक्ति के रूप में, मनुष्यों में सिद्धि और बुद्धि के रूप में तथा देवों में पुष्टि के रूप में। यह तो सम्मार्जन का एक प्रकार है जो केवल देवों हेतु पात्र सम्मार्जन के लिए किया जाता है। सम्मार्जन का दूसरा अंश आपः है जो कुशा द्वारा किया जाता है। कुशा से क्या तात्पर्य है, इसका प्रत्यक्ष रूप से तो कहीं उल्लेख नहीं है। लेकिन परोक्ष कथनों से कुशा को समझना होगा। ब्रह्म पुराण १.११०.४१ में उल्लेख है कि केशव ने स्वरोमों से उत्पन्न कुशों से पितरों का तर्पण किया। इसका अर्थ यह हुआ कि रोमांच की अवस्था कुश उत्पन्न होने की अवस्था है। रोमांच को कण्टक कहा जाता है। शतपथ ब्राह्मण ५.३.२.७ में उल्लेख है कि मित्र की स्थिति में न तो कुश ही हिंसा करता है, न ही कांटा। मित्र सबका मित्र होता है। शतपथ ब्राह्मण ३.१.२.१६ में उल्लेख है कि पुरुष के शरीर पर जहां भी कुश आदि चुभ जाता है, वहां से लोहित रक्त निकलने लगता है। इसका कारण यह है कि मनुष्य के त्वचा नहीं होती। मनुष्य ने अपनी त्वचा गौ को दे दी थी। इसी कारण से मनुष्य को त्वचा के स्थान पर वस्त्र धारण करने पडते हैं। शतपथ ब्राह्मण ५.२.१.८ में उल्लेख है कि नेष्टा नामक ऋत्विज जब यजमान-पत्नी को यज्ञमण्डप में लाता है तो उसको कौश(कुश-निर्मित वस्त्र) धारण करा देता है। इसका कारण यह है कि पत्नी का नाभि से नीचे का भाग अमेध्य होता है, जबकि दर्भ या कुश मेध्य होते हैं। इन सभी उल्लेखों में कुश का अर्थ रोमांच लेना होगा।

     ऐसा कहा जा सकता है कि मार्जन का, संशोधन का कार्य वरुण देवता का है और वरुण देवता मार्जन का कार्य बन्धन लगा कर, बन्धन में डालकर, ग्रन्थियां उत्पन्न करके करता है। वैदिक साहित्य में प्रयत्न किया गया है कि किस प्रकार कम से कम बन्धन लगाते हुए मार्जन का कार्य सम्पन्न किया जाए। इसका उपाय यह सोचा गया कि वरुण के साथ मित्र देवता की भी प्रतिष्ठा की जाए। मित्र का प्रभाव जितना अधिक होगा, वरुण का प्रभाव उतना ही कम होता जाएगा।

          कथासरित्सागर ९.१.७३ में एक कथा आती है कि वाल्मीकि ने लव को उसकी शय्या पर नहीं देखा तो सीता के भय से उन्होंने कुश से उसकी देह का निर्माण कर उसको लव के स्थान पर रख दिया। वही बाद में सीता-पुत्र कुश कहलाया। यह कथा बहुत सार्थक प्रतीत होती है। लव/रव का तात्पर्य श्रव, श्रवण हो सकता है क्योंकि लव का राज्य श्रावस्ती पुरी में है। यह श्रवण श्रुति का कोई रूप हो सकता है। लेकिन यह श्रवण वाल्मीकि के काम का नहीं है क्योंकि यह वर्म, कवच नहीं बन सकता। अतः वाल्मीकि लव को नहीं देख पाता। वाल्मीकि के काम तो कुश ही है जो रोमांच उत्पन्न करता है, कवच बनता है।  

     जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, शतपथ ब्राह्मण ५.३.२.७ में उल्लेख है कि मित्र की स्थिति में न तो कुश हिंसा करता है, न कांटा। इस कथन को और आगे ले जाया जा सकता है। दैनिक जीवन में घटने वाली प्रत्येक सामान्य सी घटना भी जब हमारे ऊपर कांटे जैसा प्रभाव डाले और हमारा मैत्री भाव स्थिर रहे, तभी मित्र की स्थिति कही जा सकती है। यही पुराणों के कौशिक विश्वामित्र की स्थिति हो सकती है। विश्वामित्र को पुराणों में मूल रूप से क्षत्रिय कहा जाता है जिन्होंने अपनी साधना से ब्राह्मणत्व प्राप्त किया।

क्षत्रिय और ब्राह्मण का एक अन्तर बहुत सूक्ष्म रूप से शतपथ ब्राह्मण १.४.१.१७ में बताया गया है। आख्यान है कि विदेह माथव राजा जब अग्नि को अपने मुख में धारण करने में असमर्थ हो गया तो वह अग्नि पृथिवी पर गिर पडी और उसने पृथिवी को जलाना आरम्भ कर दिया। उसने सब नदियों को जला दिया, लेकिन जो सदानीरा(जिसमें सदा नीर रहता है-सायण भाष्य) नदी है, जो गिरि के उत्तर में बहती है, उसे नहीं जलाया। जिस भाग को उसने जला दिया, उसमें तो बहुत से ब्राह्मण निवास करते हैं। जो भाग नहीं जलाया, वह ब्राह्मणों के निवास के अयोग्य है। इस प्रकार सदानीरा नदी मर्यादा है। सदानीरा नदी के एक ओर विदेह है, एक ओर कोसल राज्य। कोसल राज्य ब्राह्मणों के निवास के अयोग्य है। कोसल शब्द का मूल कुश प्रतीत होता है। अग्नि द्वारा जलाने से तात्पर्य पापों को जलाने से हो सकता है।

     वैदिक साहित्य में एक तो कुश शब्द है, एक कुशी। कर्मकाण्ड में उद्गाता गण द्वारा सामगान करते समय जो प्रादेशमात्र काष्ठ खण्ड पृथिवी पर स्थापित किया जाता है, उसे वैदिक पदानुक्रम कोश में कुशी कहा गया है। कुशी दो प्रकार की होती है स्वर्ण और रजत प्रकार की(ते कुश्यौ । व्यघ्नन् । ते अहोरात्रे अभवताम् । अहरेव सुवर्णाभवत् । रजता रात्रिः । स यदादित्य उदेति । एतामेव तत्सुवर्णां कुशीमनु समेति । अथ यदस्तमेति । एतामेव तद्रजतां कुशीमनु संविशति । - तैत्तिरीय ब्राह्मण १.५.१०.७), हिरण्मय्योर्ह कुश्योरन्तरवहित आस । ते ह स्म क्षुरपवी निमेषं निमेषमभिसंधत्तो दीक्षातपसौ हैव ते आसतुस्तमेते गन्धर्वाः सोमरक्षा जुगुपुरिमे धिष्ण्या इमा होत्राः - शतपथ ब्राह्मण ३.६.२.९ इत्यादि)। इन्हें दीक्षा और तप कहा गया है। जैमिनीय ब्राह्मण ३.४० में सामगान के निधन की तुलना कुशी से की गई है जिसके द्वारा दिशाओं का वेधन किया जाता है, वैसे ही जैसे कुशी द्वारा चर्म का वेधन किया जाता है। वर्तमान काल में कुशी का महत्त्व इसलिए है कि गौतम बुद्ध की मृत्यु कुशीनारा स्थान पर कही जाती है और बौद्ध धर्मावलम्बियों में इन दोनों शब्दों का बहुत महत्त्व है। वैदिक दृष्टिकोण से, कुशीनारा से तात्पर्य कर्मकाण्ड की अन्वाहार्यपचन अग्नि या दक्षिणाग्नि से हो सकता है। इस अग्नि का देवता नल नैषध है। पुराणों का नल-दमयन्ती आख्यान प्रसिद्ध ही है। नल के बारे में प्रसिद्ध है कि उसे जो ८ वरदान मिले हुए थे, उनमें से एक वरदान यह था कि वह जहां चाहेगा, वहीं जल प्रकट हो जाएगा। और पुराणों का सार्वत्रिक श्लोक है आपो नारा इति प्रोक्ता, अर्थात् आपः को नारा कहा जाता है। नर शब्द इंगित करता है कि इस स्थिति में द्यूत विद्यमान हो भी सकता है, नहीं भी।

 

अधिपति-ज्योतिष्मान्/हिरण्यरेता

वर्ष नाम

अग्नि ११९.११

कूर्म

गरुड १.५७.९

देवीभागवत ८.१२.३०(हिरण्यरेता)

ब्रह्माण्ड १.२.१९.५४

भागवत ५.२०.१४

मत्स्य १२२.६५

वराह ८७.१

विष्णु २.४.३४

उद्भिद

 

उद्भिद

वसु

उद्भिद

वसु

उन्नत/श्वेत

श्वेत/उद्भिद्

उद्भिद

धेनुमान्

 

वेणुमान्

वसुदान

वेणुमण्डल

वसुदान

लोहित/वेणुमण्डल

लोहित/वेणुमण्डल

वेणुमान्

द्वैरथ

 

द्वैरथ/स्वैरथ

दृढरुचि

रथाकार

दृढरुचि

जीमूत/स्वैरथाकार

जीमूत/रथाकार

वैरथ

लम्बन

 

लम्बन

नाभिगुप्त

लवण

नाभिगुप्त

हरिकं/लवण

हरि/बलाधनं

लम्बन

धैर्य्य

 

धृति

स्तुत्यव्रत

धृतिमद्

स्तुत्यव्रत

ककुद्/धृतिमान्

x

धृति

कपिल

 

प्रभाकर

विविक्त

प्रभाकर

विविक्त

महिष/प्रभाकर

x

प्रभाकर

प्रभाकर

 

कपिल

देवक

कपिल

वामदेव

कपिल

x

कपिल

 

पर्वत नाम

अग्नि ११९.१३

कूर्म १.४९.२०

गरुड १.५७.१०

देवीभागवत ८.१२.३०

ब्रह्माण्ड १.२.१९.५४

भागवत ५.२०.१५

मत्स्य १२२.५१

वराह ८७.१

विष्णु २.४.४१

विद्रुम

विद्रुम

विद्रुम

चक्र

विद्रुम

चक्र

कुमुद/विद्रुमोच्चय

कुमुद/विद्रुम

विद्रुम

हेमशैल

होम/हेम

हेमशैल

चतुःशृङ्ग

हेम

चतुःशृङ्ग

उन्नत/हेम

उन्नत/हेम

हेमशैल

द्युतिमान्

द्युतिमान्

द्युतिमान्

कपिल

द्युतिमान्

कपिल

बलाहक/द्युतिमान्

बलाहक

द्युतिमान्

पुष्पवान्

पुष्पवान्

पुष्पवान्

चित्रकूट

पुष्पवान्

चित्रकूट

द्रोण/पुष्पवान्

द्रोण/पुष्पवान्

पुष्पवान्

कुशेशय

कुशेशय

कुशेशय

देवानीक

कुशेशय

देवानीक

कङ्क/कुशेशय

कङ्क/कुशेशय

कुशेशय

हरि

हरि

हरि

ऊर्ध्वरोमा

हरि

ऊर्ध्वरोमा

महिष/हरि

महिष/हरि

हरि

मन्दराचल

मन्दर

मन्दराचल

द्रविण

मन्दर

द्रविण

ककुद्मान्/मन्दर

ककुध्र/मन्दर

मन्दराचल

 

नदी नाम

कूर्म १.४९.२१

गरुड १.५७.११

देवीभागवत ८.१२.३३

ब्रह्माण्ड १.२.१९.६१

भागवत ५.२०.१५

मत्स्य १२२.७१

वराह ८७.३

विष्णु २.४.४२

धूतपापा

धूतपापा

रसकुल्या

धूतपापा

रसकुल्या

धूतपापा/योनि

प्रतोया/ प्रवेशा

धूतपापा

शिवा

शिवा

मधुकुल्या

शिवा

मधुकुल्या

सीता/निशा

शिवा/ यशोदा

शिवा

पवित्रा

पवित्रा

मित्रविन्दा

प वित्रा

मित्रविन्दा

पवित्रा/वितृष्णा

चित्रा/ कृष्णा

पवित्रा

सम्मिता

सन्मति

श्रुतविन्दा

सन्तति

श्रुतविन्दा

ह्रादिनी/चन्द्रभा

ह्रादिनी/ चन्द्रा

सम्मति

विद्युत्

विद्युदभ्रा

देवगर्भा

विद्युत्/विद्युद्दम्भा

देवगर्भा

विद्युत्/शुक्ला

विद्युल्लता/ शुक्ला

विद्युत/विद्युदम्भा

प्रभा

मही

घृतच्युत्

दम्भा

घृतच्युता

पुण्ड्रा/विभावरी

वर्णा/ विभावरी

अम्भा

रामा

x

मन्दमालिका

मही

मन्त्रमाला

महती/धृति

महती/ धृति

मही

 

कुश

संदर्भ

उपह्वरेषु यदचिध्वं ययिं वय इव मरुतः केन चित्पथा।

श्चोतन्ति कोशा उप वो रथेष्वा घृतमुक्षता मधुवर्णमर्चते॥ १.०८७.०२

तुभ्यायं सोमः परिपूतो अद्रिभिः स्पार्हा वसानः परि कोशमर्षति शुक्रा वसानो अर्षति।

तवायं भाग आयुषु सोमो देवेषु हूयते।

वह वायो नियुतो याह्यस्मयुर्जुषाणो याह्यस्मयुः॥ १.१३५.०२

वृष्णः कोशः पवते मध्व ऊर्मिर्वृषभान्नाय वृषभाय पातवे।

वृषणाध्वर्यू वृषभासो अद्रयो वृषणं सोमं वृषभाय सुष्वति॥ २.०१६.०५

इन्द्र दृह्य यामकोशा अभूवन्यज्ञाय शिक्ष गृणते सखिभ्यः।

दुर्मायवो दुरेवा मर्त्यासो निषङ्गिणो रिपवो हन्त्वासः॥ ३.०३०.१५

आपूर्णो अस्य कलशः स्वाहा सेक्तेव कोशं सिसिचे पिबध्यै।

समु प्रिया आववृत्रन्मदाय प्रदक्षिणिदभि सोमास इन्द्रम्॥ ३.०३२.१५

गव्यन्त इन्द्रं सख्याय विप्रा अश्वायन्तो वृषणं वाजयन्तः।

जनीयन्तो जनिदामक्षितोतिमा च्यावयामोऽवते न कोशम्॥ ४.०१७.१६

गिरिर्न यः स्वतवाँ ऋष्व इन्द्रः सनादेव सहसे जात उग्रः।

आदर्ता वज्रं स्थविरं न भीम उद्नेव कोशं वसुना न्यृष्टम्॥ ४.०२०.०६

आ यं नरः सुदानवो ददाशुषे दिवः कोशमचुच्यवुः।

वि पर्जन्यं सृजन्ति रोदसी अनु धन्वना यन्ति वृष्टयः॥ ५.०५३.०६

मिमातु द्यौरदितिर्वीतये नः सं दानुचित्रा उषसो यतन्ताम्।

आचुच्यवुर्दिव्यं कोशमेत ऋषे रुद्रस्य मरुतो गृणानाः॥ ५.०५९.०८

महान्तं कोशमुदचा नि षिञ्च स्यन्दन्तां कुल्या विषिताः पुरस्तात्।

घृतेन द्यावापृथिवी व्युन्धि सुप्रपाणं भवत्वघ्न्याभ्यः॥ ५.०८३.०८

प्रस्तोक इन्नु राधसस्त इन्द्र दश कोशयीर्दश वाजिनोऽदात्।

दिवोदासादतिथिग्वस्य राधः शाम्बरं वसु प्रत्यग्रभीष्म॥ ६.०४७.२२

दशाश्वान्दश कोशान्दश वस्त्राधिभोजना।

दशो हिरण्यपिण्डान्दिवोदासादसानिषम्॥ ६.०४७.२३

यस्मिन्विश्वानि भुवनानि तस्थुस्तिस्रो द्यावस्त्रेधा सस्रुरापः।

त्रयः कोशास उपसेचनासो मध्वः श्चोतन्त्यभितो विरप्शम्॥ ७.१०१.०४

त्रयः कोशासः श्चोतन्ति तिस्रश्चम्वः सुपूर्णाः।

समाने अधि भार्मन्॥ ८.००२.०८

आ दशभिर्विवस्वत इन्द्रः कोशमचुच्यवीत्।

खेदया त्रिवृता दिवः॥ ८.०७२.०८

अभि सोमास आयवः पवन्ते मद्यं मदम्।

अभि कोशं मधुश्चुतम्॥ ९.०२३.०४

स वह्निः सोम जागृविः पवस्व देववीरति।

अभि कोशं मधुश्चुतम्॥ ९.०३६.०२

अच्छा कोशं मधुश्चुतमसृग्रं वारे अव्यये।

अवावशन्त धीतयः॥ ९.०६६.११

अव द्युतानः कलशाँ अचिक्रदन्नृभिर्येमानः कोश आ हिरण्यये।

अभीमृतस्य दोहना अनूषताधि त्रिपृष्ठ उषसो वि राजति॥ ९.०७५.०३

वृषेव यूथा परि कोशमर्षस्यपामुपस्थे वृषभः कनिक्रदत्।

स इन्द्राय पवसे मत्सरिन्तमो यथा जेषाम समिथे त्वोतयः॥ ९.०७६.०५

प्र त आशवः पवमान धीजवो मदा अर्षन्ति रघुजा इव त्मना।

दिव्याः सुपर्णा मधुमन्त इन्दवो मदिन्तमासः परि कोशमासते॥ ९.०८६.०१

यज्ञस्य केतुः पवते स्वध्वरः सोमो देवानामुप याति निष्कृतम्।

सहस्रधारः परि कोशमर्षति वृषा पवित्रमत्येति रोरुवत्॥ ९.०८६.०७

प्र तु द्रव परि कोशं नि षीद नृभिः पुनानो अभि वाजमर्ष।

अश्वं न त्वा वाजिनं मर्जयन्तोऽच्छा बर्ही रशनाभिर्नयन्ति॥ ९.०८७.०१

एते सोमा अति वाराण्यव्या दिव्या न कोशासो अभ्रवर्षाः।

वृथा समुद्रं सिन्धवो न नीचीः सुतासो अभि कलशाँ असृग्रन्॥ ९.०८८.०६

मर्यो न शुभ्रस्तन्वं मृजानोऽत्यो न सृत्वा सनये धनानाम्।

वृषेव यूथा परि कोशमर्षन्कनिक्रदच्चम्वोरा विवेश॥ ९.०९६.२०

परि कोशं मधुश्चुतमव्यये वारे अर्षति।

अभि वाणीर्ऋषीणां सप्त नूषत॥ ९.१०३.०३

प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा।

अंशोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्चुतम्॥ ९.१०७.१२

अपो वसानः परि कोशमर्षतीन्दुर्हियानः सोतृभिः।

जनयञ्ज्योतिर्मन्दना अवीवशद्गाः कृण्वानो न निर्णिजम्॥ ९.१०७.२६

अभि द्युम्नं बृहद्यश इषस्पते दिदीहि देव देवयुः।

वि कोशं मध्यमं युव॥ ९.१०८.०९

दोहेन गामुप शिक्षा सखायं प्र बोधय जरितर्जारमिन्द्रम्।

कोशं न पूर्णं वसुना न्यृष्टमा च्यावय मघदेयाय शूरम्॥ १०.०४२.०२

चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा अभ्यञ्जनम्।

द्यौर्भूमिः कोश आसीद्यदयात्सूर्या पतिम्॥ १०.०८५.०७

प्रीणीताश्वान्हितं जयाथ स्वस्तिवाहं रथमित्कृणुध्वम्।

द्रोणाहावमवतमश्मचक्रमंसत्रकोशं सिञ्चता नृपाणम्॥ १०.१०१.०७

 

द्वयेनैव देवेभ्यो निर्णेनिजत्येकेन मनुष्येभ्योऽद्भिश्च ब्रह्मणा च देवेभ्य आपो हि कुशा ब्रह्म यजुरेकेनैव मनुष्येभ्योऽद्भिरेवैवम्वेतन्नाना भवति माश १.३.१.३

अवच्छितो हि वै पुरुषः । तस्मादस्य यत्रैव क्व च कुशो वा यद्वा विकृन्त तत एव लोहितमुत्पतति तस्मिन्नेतां त्वचमदधुर्वास एव  माश ३.१.२.१६             

येस्थवीयांसोऽपरिभिन्नास्ते मैत्रा न वै मित्रः कं चन हिनस्ति न मित्रं कश्चन हिनस्ति नैनं कुशो न कण्टको विभिनत्ति नास्य व्रणश्चनास्ति सर्वस्य ह्येव मित्रो मित्रम् माश ५.३.२.७

*अग्निष्टोम प्रातःसवनम् : अथ दक्षिणे द्वार्बाहौ कुशहस्तमुपनिगृह्य दर्भणं प्रवयति दर्भणे स्पन्द्यां विष्णोः स्यूरसीति बौ.श्रौ.सू. 6.25

*प्रायणीयम् - द्वौ कुशमयौ वेदावेकं मौञ्जं वेदं बौ.श्रौ.सू. 9.5:8

*अथैतं कुशमयं वेदं विस्रस्य दध्ना मधुमिश्रेण समज्य जघनेन प्रचरणीयं महावीरं प्रतीचीनाग्रं संस्पृष्टं विस्तृणाति बौ.श्रौ.सू. 9.15

*अग्निचयनम् : उखाः संभरिष्यन्नुपकल्पयते अश्वं च गर्दभं च तयोरेव रशने मौञ्ज्यौ वा कुशमय्यौ वा। - बौ.श्रौ.सू. 10.1:2

**पर्णमयमिध्ममित्यथ वृथाग्निमुपसमाधाय कुशमयं बर्हिं स्तीर्त्वा पर्णमयान्परिधीन्परिधाय - - - - बौ.श्रौ.सू. 14.16

*अश्वमेध : द्वे रशने मौञ्जं च कुशमयीं चोभे त्रयोदशारत्नि बौ.श्रौ.सू. 15.2:3

*ऐषीकं शूर्पमिति। सूत्रं बौधायनस्य दर्भमयं कुशमयं वेति शालीकि प्रत्यक्षमित्यौपमन्यवः। - बौ.श्रौ.सू. 21.2:22

*इध्माबर्हिषोरुपसादनं इति। - - - - -अत्रैवास्मा आसीनायेध्माबर्हिराहरेत्तदादाय प्राङि्यात्कुशहस्तश्च पृष्ठ्याकालं प्राङ् स्तृणन्गच्छेदिति। - बौ.श्रौ.सू. 21.14

*स्वयंकृतेष्विति। सूत्रं शालीकेरत्रो ह स्माह बौधायनो गोन्यासप्रमृदितानां कुशानां बर्हिः संनह्येत्स्वयंपतितानां काष्ठानामिध्मं बौ.श्रौ.सू. 22.17

*कोशं बर्हिः। - का.श्रौ.सू. 1.3.12

*कुशौ समावप्रशीर्णाग्रावनन्तर्गर्भौ कुशैः छिनत्ति पवित्रे स्थ इति का.श्रौ.सू. 2.3.30

*वसोः पवित्रमिति पवित्रमस्यां बध्नाति कुशौ। त्रिवृद्वा। - का.श्रौ.सू. 4.2.15

*अग्नेर्जनित्रमिति शकलमादाय वेद्यां करोति। वृषणाविति कुशतरुणे तस्मिन् का.श्रौ.सू. 5.1.2

*कुशप्रस्वः प्रस्तर उपसन्नद्धः का.श्रौ.सू. 5.1.20

*त्र्येण्या शलल्या विनीय त्रीणि कुशतरुणान्यन्तर्दधात्योषध इति का.श्रौ.सू. 5.2.15

*अनैडकीरूर्णाः प्रक्षाल्याश्लेषयेत्तयोः। कुशोर्णा वा ऽभावे। - का.श्रौ.सू. 5.3.8

*ओषध इति कुशतरुणं तिरस्कृत्य स्वधित इति परशुना प्रहरति का.श्रौ.सू. 6.1.12

*परिवीयमाणायानुवाचयति त्रिगुणं त्रिव्यामा कौशीं रशना तया नाभिमात्रे त्रिवृतं परिव्ययति। - का.श्रौ.सू. 6.3.13

*द्विगुणरशनया द्विव्यामया कौश्या पाशं कृत्वाऽन्तरा शृङ्गमभिदक्षिणं बध्नात्यृतस्य त्वेति। - का.श्रौ.सू. 6.3.24

*यूपवत्कुशतरुणम्(अन्तर्दधाति) का.श्रौ.सू. 7.2.8

*कुशपवित्रैश्चित्पतिर्मेति पावयति सप्तभिः सप्तभिः प्रतिमन्त्रमच्छिद्रेणेति - - -का.श्रौ.सू. 7.3.1

*मैत्रावरुणमयं वामिति। पयसा श्रीणात्येनं कुशावन्तर्धाय राया वयमिति का.श्रौ.सू. 9.6.9

*हूयमानेषु कुशतरुणेन जुहोत्यहं त्वदस्मीत्यहं त्वदस्मीति का.श्रौ.सू. 10.9.31

*नेष्टा पत्नीमानेष्यन्कौशं वासः परिधापयति चण्डातकं दहरं वा। - का.श्रौ.सू. 14.4.21

*पञ्चगृहीतेनोद्गृह्णन्नभिजुहोति सजूरब्द इति। कुशस्तम्बमुपदधाति मध्ये तूष्णीम् का.श्रौ.सू. 17.3.1

*उत्तरवेदिं निवपति चत्वारिंशत्पदां युगमात्रीं वा सर्वतः कुशस्तम्बे का.श्रौ.सू. 17.3.13

*(यदि मन्थन पर अग्नि उत्पन्न न हो तो आहुति) : कुशस्तम्बे वा का.श्रौ.सू. 25.4.6

*कुशतरुणेन जुहोति हुतस्य चाहुतस्य चाहुतस्य हुतस्य च पीतापीतस्य सोमस्येन्द्राग्नी पिबतं सुतमिति। वषट्कृते। - का.श्रौ.सू. 25.12.1

*समस्तपाण्यङ्गुष्ठोऽग्रेणाहवनीयं परीत्य दक्षिणतः कुशेषूपविशेत् आश्वलायन श्रौ.सू. 1.12.8

*पूर्वामाहुतिं हुत्वा कुशेषु सादयित्वा गार्हपत्यमवेक्षेत पशू्न्मे मच्छेति। अथोत्तरां - - - भूयिष्ठं स्रुचि शिष्ट्वा त्रिरनुप्रकम्प्यावमृज्य कुशमूलेषु निमार्ष्टि पशुभ्यस्त्वेति। - आ.श्रौ.सू. 2.3.20

*अथैनां कुशैः प्रक्षाल्य चतस्रः पूर्णाः प्रागुदीच्योर्निनयतृतुभ्य स्वाहा दिग्भ्य स्वाहा - - - -आ.श्रौ.सू. 2.4.13

*पञ्चमीं कुशदेशे पृथिव्याममृतं जुहोम्यग्नये वैश्वानराय स्वाहेति। षष्ठं पश्चाद्गार्हपत्यस्य प्राणममृते जुहोम्यमृतं प्राणे जुहोमि स्वाहेति आ.श्रौ.सू. 2.4.14

*- - - - -शीतोष्णा अपः समानीयैकविंशतिमासु यवान्कुशपिञ्जूलांश्चावधाय ताभिरद्भिरवर्थं कुर्वीत ताभिरेनमाप्लायवयेज्जीवानामस्यता 3 । - - आ.श्रौ.सू. 6.9.1

*यावत्यो यावत्यः कुशानां नवतो दशतो वा। निष्केवल्ये तावतिसूक्ता मध्यंदिनाः स्युरिति महान्यायः। - आ.श्रौ.सू. 8.5.7

*विवाहे प्रतिश्रुति होमः : दक्षिणेन कुशानादाय सव्येनापनोति। दक्षिणं जान्वाच्य प्रागग्रैः कुशैः परिस्तृणाति। त्रिवृत् पञ्चवृद्वा। पुरस्तात् प्रथमम्। अथ पश्चान्मूलान्यग्रैः प्रच्छादयति - - - कौषीतक गृह्य सूत्र 1.3.6

*विवाहे प्रतिश्रुतिहोमः : दक्षिणेन कुशानादाय सव्येनापनोति। - - -  अलंकृत्य कुशतरुणाभ्यां प्रदक्षिणमग्निं त्रिः पर्युक्षति महान्तं कोशं इति कौ.गृ.सू. 1.5.1

*गर्भ रक्षणम् : तृतीये मासि पुंसुवनम्। पुष्येण श्रवणेन वा सोमांशुं प्रेषयित्वा कुशदण्डकं वा न्यग्रोधस्य वा स्कन्धस्यान्त्यां शुङ्गां यूपस्याग्निष्ठां वा संस्थिते वा यज्ञे जुह्वः संस्रवाम् कौ.गृ.सू. 1.12.8

*चूळाकर्म : अग्निमुपसमाधाय - - - - अनळुहं कुशभित्तिं च केशप्रतिग्रहणमादर्शं लोहक्षुरं नवनीतं चोत्तरत उपनिदधाति। - कौ.गृ.सू. 1.21.6

*चूडाकर्म : - - - केशपक्षं त्रिरभ्यनक्ति। एवमेव नवनीतेन छित्वा। ओषधे त्रायस्वैनम् इति कुशतरुणमन्तर्निदधाति। केशान् कुशतरुणं चादर्शेन स्पृष्ट्वा तेजोऽसि स्वधितिष्टे पिता मैनं हिंसीः इति लोहक्षुरमादत्ते येनावपत् सविता क्षुरेण - - - इति केशाग्राणि छिनत्ति कुशतरुणं वा। - कौ.गृ.सू. 1.21.10

*उपनयने सावित्र्यनुवचनम् : अभिवाद्य पादावाचार्यस्य च पाणी प्रक्षाल्य मूले कुशतरुणान् गृह्णाति। तान् सव्येनाचार्योऽग्रे संगृह्य दक्षिणेनाद्भिः परिषिञ्चति। - - - कौ.गृ.सू. 2.4.3

*समा ते कुशतरुणानादाय आनळुहेन गोमयेन मूलकुण्डं कृत्वा यथोक्तमद्भिः परिषिञ्चति कौ.गृ.सू. 2.4.24

*सर्पबलिः : उत्तरेणाग्निं प्रागग्रेषु कुशेषु शुचौ वा देशे दिव्यानां सर्पाणामधिपतिं उन्नीयताम् दिव्याः सर्पा उन्नीयताम् इत्यपो निनयति कौ.गृ.सू. 4.2.3

*और्ध्वदेहिकम् : प्रेतमाहिताग्निं ज्ञात्वाजस्रानग्नीन् कुर्वन्ति। विहारं दक्षिणतो विहृत्य। कुशानामेवमग्रता। - कौ.गृ.सू. 5.1.6

*अप्रच्छिन्नाग्रावनन्तर्गर्भौ प्रादेशमात्रौ कुशौ नाना ऽन्तयोर्गृहीत्वा ऽङ्गुष्ठोपकनिष्ठिकाभ्यां उत्तानाभ्यां पाणिभ्यां आ.गृ.सू. 1.3.3

*त्रेण्या च शलल्या त्रिभिश्च कुशपिञ्चूलैर्रूध्वं सीमन्तं व्यूहति भूर्भुवः स्वरोमिति त्रिः आ.गृ.सू. 1.14.4

*चतसृषु चतसृषु कुशसूनासु चतसृषु दिक्षु बलिं हरेद्यास्ते रुद्र पूर्वस्यां दिशि सेना आश्वलायन गृह्य सूत्र 4.9.20

*स वै कुशैः(अग्निं) उद्धरति दारुभिर्वा अग्र उद्धरति दारुभिरग्रे दारुभिरपरं जामि कुर्यात्समदं कुर्यादापो वै वर्षा आपः कुशा वर्षा ऋतून्प्राविशदद्भिरेवैनमेतदद्भ्यो निर्मिमीते। - काण्व शतपथ ब्राह्मण 1.2.3.9

*केश वपनम् : स कुशतरुणकमभिनिदधात्योषधे त्रायस्वेति वज्रो वा एष यत्क्षुरस्तदेनमेतदोषधिभिरेवान्तर्दधाति तथैनमेष वज्रो न हिनस्ति स्वधिते मैन ँ हि ँसीरिति प्रच्छिनत्ति का.श.ब्रा. 4.1.2.5

*अथैनं कुशतरुणकैः पवयति पवित्रं वै मेधः कुशाः पवित्रपूतो मेध्यो दीक्षा इति तदेकमेव स्यादयं वाव पवित्रं योऽयं पवते स वा अयमेक इवैव पवते सो ऽयं पुरुषे ऽन्तः प्रविष्टः प्राङ् च प्रत्यङ् च तौ प्राणोदानौ का.श.ब्रा. 4.1.3.14

*सो ऽधिमन्थनमादत्ते ऽग्नेर्जनित्रमसीत्येतस्माद्धि दारुणो ऽधिजायते वृषणौ स्थ इति कुशतरुणके तद्याविमौ स्त्रिया एतावेवैता उर्वश्यसीत्यधरारणिम् आयुरसीत्याज्यविलापन्यामनक्ति पुरूरवा असीत्युत्तरारणिम् का.श.ब्रा. 4.4.1.14

*यूप व्रश्चनम् : अथ यत्र वृश्चन्भवति तत्कुशतरुणकमभिनिदधात्योषधे त्रायस्वेति वज्रो वा एष यत्परशुस्तदेनमेतद् ओषधिभिरेवान्तर्दधाति तथैनमेष वज्रो न हिनस्ति स्वधिते मैन ँ हि ँसीरिति प्रहरति का.श.ब्रा. 4.6.4.13

*अथैतां परिस्रुतमाहरन्ति तां कुशपवित्रेण पवयति पवित्रं वै मेधः कुशाः पवित्रपूतया मेध्यया प्रचराणीति। - का.श.ब्रा. 7.5.1.14

चतुर्धा वा एतास् तिस्रस्तिस्रो रात्रयो यद् द्वादशोपसदः । याः प्रथमा यज्ञं ताभिः सम् भरति या द्वितीया यज्ञं ताभिर् आ रभते यास् तृतीयाः पात्राणि ताभिर् निर्णेनिक्ते याश् चतुर्थीर् अपि ताभिर् आत्मानम् अन्तरतः शुन्धते – तैसं. ७.२.१०.४

*हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात् कुशाच्छन्दस्तुत्युपगानवत्तदुक्तम् ब्रह्मसूत्र 3.3.26

Modern technology of saving memory on a disk involves coating of a surface with an anisotropic  magnetic material whose particles have axial shape. The advantage of axial shape is that the magnetic field of one particle does not interact with the magnetic field of the other. Thus, to feed some information, the magnetic field inside one axial particle can be changed while other particles will remain unaffected. It seems that the same idea has been expoited in the area of consciousness also. There is so much talk of axis in ancient mythology. In common parlance, there is still a word called Kushaagra Buddhi for one who has sharp intellect.  Here Kusha is a grass which has sharp edges. This can be called a form of axis. The plough is another example of an axis used to write information, supposedly on earth. Our whole body is covered with fine hair. These hair are also a form of axis. And the palm, face etc.  are  free from hair. Palm is used to write the information on hair.

Smriti

Further details

 

प्रथम लेखन १७-६-२०११ ई.(आषाढ कृष्ण द्वितीया, विक्रम संवत् २०६८)

 

https://www.botanicalbeads.com/BBB_page_70.html

In India, when performing special religious rites widows must have rings of Kusha grass, Eragrostis cynosuroides, on the two ring fingers.  Married women are to wear rings made of Dura grass, Cynodon dactylon.

 

 

https://web.archive.org/web/20110717105128/https://www.trsiyengar.com/id65.shtml

 

The count of leaves depends upon the function that is held viz.: for some functions related to death only Single leaf Dharbham is used; for Auspicious and daily routine a ring made of two leaves is

used; for inauspicious but not death related functions, (i.e. Amavasya Tharppanam,Pithru Pooja etc) a three leaf Dharbham ring is used. And for the Temple Prayer and Pooja, a Four-leaf Dharbham

ring is used.

 

 

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