It seems that until one has not learned how to check his outgoing radiation, his outgoing waste energy, he should not try to become universal, to serve others. Rather it is desirable that he be self centered.Keshee is the state where energy is being wasted through radiation.And then demon keshi assumes the form of a horse. According to Dr. Fatah Singh, horse in mythology is symbolic of spreading oneself outwardly, for the benefit of society. But sacred texts indicate that this form will be demonical. The opposite of ashva/horse is aksha/axis. Aksha can be understood with the help of examples of modern sciences. In a magnetic axis, all magnetic energy flows through it's axis. The only energy coming and going out is through it's poles. Similar should be the position of a devotee also.Krishna kills demon Keshee by putting his arm in his mouth. In vedic word book, arm/baahu/gabhasti in singular form has been classified under synonyms for arm, while in plural forms, these may fall under synonyms for rays etc. This indicates that putting his arm inside the mouth of demon Keshee somehow signifies channelizing the radiating energy of the demon. In vedic texts, there is reference of one Keshee Daarbhya, or Keshee who can become inward. Dribhi root means to knot oneself.

केशी

टिप्पणी पुराणों की कथा के अनुसार केशी असुर अश्व रूप धारण कर कृष्ण का वध करने के लिए आया और कृष्ण ने उसके मुख में अपनी बाहु डालकर उसको दो फाड कर दिया । केशी का असुरत्व  क्या है ? उसके द्वारा अश्व रूप धारण करने का क्या तात्पर्य है ? तथा कृष्ण ने उसे दो फाड क्यों किया ? दो फाड करने का अर्थ डा. फतहसिंह ने जरासन्ध के सन्दर्भ में किया है कि एक भाग अमर्त्य है तथा दूसरा भाग मर्त्य । ऋग्वेद १.१०.३, १.१६.४, १.८२.६, ८.१४.१२ तथा ८.१७.२ में इन्द्र के हरि नामक २ अश्व इन्द्र को यज्ञ में लाते हैं । इन हरियों का केशी विशेषण साथ में जुडा है । चूंकि ऋग्वेद की ऋचाओं में केशी के हरि या अश्व रूप का उल्लेख है, अतः पुराणों में केशी को अश्व रूप देना साभिप्राय है । जैमिनीय ब्राह्मण में कईं स्थानों पर पांचालराज केशी दार्भ्य के आख्यान दिए गए हैं जिन्हें पुराणों में राजा केशिध्वज के रूप में चित्रित किया गया है । केशी के रूप को समझने के लिए यही एकमात्र स्रोत है । जैमिनीय ब्राह्मण २.१००, २.१२२ आदि में केशी दार्भ्य के साथ केशी सात्यकामि ब्राह्मण का उल्लेख भी आता है । जैमिनीय ब्राह्मण २.१२२ में आत्मा, जाया व प्रजा अथवा इनके दूसरे रूपों ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य का कथन आता है । जाया व प्रजा आत्मा पर अवलम्बित हैं । जाया व प्रजा को भ्रातृव्य कहा गया है जिनको नष्ट करना अभीष्ट है । जैमिनीय ब्राह्मण २.१०० से संकेत मिलता है कि दार्भ्य, दर्भ वाला होना अभीष्ट नहीं है, अपितु कुश वाला होना अभीष्ट है । दर्भ में शक्ति का बिखराव है, कुश ऊर्ध्व दिशा में बढता है । उसमें ऊर्जा एक सिरे से प्रवेश करके दूसरे सिरे से ही निकलती है । अतः कुश अक्ष का रूप है, दर्भ अश्व का रूप है । कुश रूप प्राप्त करने पर प्रजा पर शासन करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है । अतः दर्भ युक्त होना केशी का एक असुरत्व हो सकता है । दूसरे असुरत्व का संकेत जैमिनीय ब्राह्मण २.५३ से मिलता है । यहां यज्ञ में दीक्षित केशी दार्भ्य को हिरण्मय हंस रूप धारण करके यूप पर बैठा याज्ञसेन दीक्षा सम्बन्धी उपदेश देता है और पृथिवी, वायु और आदित्य स्तरों पर दीक्षा ग्रहण का उपदेश देता है । यूप शिर पर शिखा का प्रतीक है । अतः केशी दार्भ्य से अगली स्थिति शिखा में स्थित होना है । इसके अतिरिक्त, दीक्षा में स्थित होकर केशी दार्भ्य अपनी ऊर्जा के बिखराव को समाप्त कर सकता है ।

          कृष्ण द्वारा केशी अश्व के मुख में बाहु डालकर उसको फाडने की कथा के संदर्भ में ऋग्वेद १.८२.६ में इन्द्र से गभस्तियों को धारण किए हुए केशी हरि - द्वय के साथ यज्ञ में आने की प्रार्थना की गई है जिससे हरियों को ब्रह्म से जोडा जा सके । गभस्तियों को हरियों का नियन्त्रण करने वाली रश्मि / रस्सी माना गया है । निघण्टु में गभस्तयः रश्मि तथा अङ्गुलि नामों के अन्तर्गत आता है जबकि  एक वचन गभस्ती बाहु नामों के अन्तर्गत आता है । अतः कहा जा सकता है कि पुराणों में कृष्ण द्वारा  अश्व के मुख में बाहु डालने का साम्य ऋग्वेद १.८२.६ की ऋचा में है । इसका और अधिक रहस्य समझना अपेक्षित है ।

          ऋग्वेद १.१६४.४४ में अग्नि, वायु व आदित्य रूपी तीन केशियों का उल्लेख आता है जो ऋतुथा हैं । यह खुला प्रश्न है कि क्या इन तीनों को सत्यथा बनाना है ? जैमिनीय ब्राह्मण २.१०० आदि में सात्यकामि केशी ब्राह्मण के उल्लेख आते हैं ।

          ऋग्वेद १०.१०२.६, १०.१३६.१, १०.१३६.६ में केशी शब्द एक वचन में प्रयुक्त हुआ है । ऋग्वेद १०.१३६.७ में केशी विष के पात्र द्वारा जल पान करता है । यहां केशी सूर्य का नाम है । जैमिनीय ब्राह्मण ३.३५० में केशी दार्भ्य द्वारा घृतस्तोक / घृत बिन्दु की कामना, अहीन आश्वत्थि द्वारा मधु स्तोक की तथा आमलक द्वारा उदक स्तोक की कामना का उल्लेख है । चूंकि घृत अग्नि को प्रिय है, अतः यह कहा जा सकता है कि केशी दार्भ्य का चरित्र केशी अग्नि के चरित्र का प्रतीक है । अथर्ववेद ८.६.५ में कृष्ण केशी असुर का उल्लेख है और पुराणों में केशी असुर का वर्णन इस मन्त्र की व्याख्या कर सकता है ।

          हरिवंश पुराण में केशी के रथ पर उष्ट्र ध्वजा चिह्न का उल्लेख है जिसके लिए उष्ट्र पर टिप्पणी पठनीय है । अवि पशु का मेध विकृत होकर उष्ट्र रूप धारण करता है । कहा गया है कि उष्ट्र अपने अन्दर सूर्य व चन्द्रमा की शक्तियों का आकर्षण करने में, उनका सम्यक् संतुलन करने में असमर्थ है, अतः अक्षियों के सिवाय उसका प्रत्येक अङ्ग विकृत है । हो सकता है कि कृष्ण के माध्यम से यह कार्य सम्पन्न होता हो । कृष्ण शब्द का अर्थ कर्षण करना, कृषि करना होता है । जैमिनीय ब्राह्मण में केशी दार्भ्य को दीक्षा ग्रहण करते हुए प्रदर्शित किया गया है । दीक्षा का अर्थ भी शक्तियों को संतुलित करने से ही हो सकता है ।

 

संदर्भ
*युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा। अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर ॥ - ऋग्वेद १.१०.३

*उप नः सुतमा गहि हरिभिरिन्द्र केशिभिः। सुते हि त्वा हवामहे ॥ - ऋ. १.१६.४

*युनज्मि ते ब्रह्मणा केशिना हरी उप प्र याहि दधिषे गभस्त्योः। उत् त्वा सुतासो रभसा अमन्दिषुः पूषण्वान् वज्रिन्त्समु पत्न्यामदः ॥ - ऋ. १.८२.६

*त्रयः केशिन ऋतुथा विचक्षते संवत्सरे वपत एक एषाम्। विश्वमेको अभि चष्टे शचीभिर्ध्राजिरेकस्य ददृशे न रूपम् ॥ - ऋ. १.१६४.४४

*ऋतस्य वा केशिना योग्याभिर्घृतस्नुवा रोहिता धुरि धिष्व। अथा वह देवान् देव विश्वान् त्स्वध्वरा कृणुहि जातवेदः ॥ - ऋ. ३.६.६

*अर्वाञ्चं त्वा सुखे रथे वहतामिन्द्र केशिना। घृतस्नू बर्हिरासदे ॥ - ऋ. ३.४१.९

*आ त्वा सहस्रमा शतं युक्ता रथे हिरण्यये। ब्रह्मयुजो हरय इन्द्र केशिनो वहन्तु सोमपीतये ॥ - ऋ. ८.१.२४

*इन्द्रमित् केशिना हरी सोमपेयाय वक्षतः। उप यज्ञं सुराधसम् ॥ - ऋ.८.१४.१२

*आ त्वा ब्रह्मयुजा हरी वहतामिन्द्र केशिना। उप ब्रह्माणि नः शृणु ॥ - ऋ. ८.१७.२

*यच्छक्रासि परावति यदर्वावति वृत्रहन्। अतस्त्वा गीर्भिर्द्युगदिन्द्र केशिभिः सुतावाँ आ विवासति ॥ - ऋ. ८.९७.४

*ककर्दवे वृषभो युक्त आसीदवावचीत् सारथिरस्य केशी। दुधेर्युक्तस्य द्रवतः सहानस ऋच्छन्ति ष्मा निष्पदो मुद्गलानीम् ॥ - ऋ. १०.१०२.६

*हरी यस्य सुयुजा विव्रता वेरर्वन्तानु शेपा। उभा रजी न केशिना पतिर्दन् ॥ - ऋ. १०.१०५.२

*केश्यग्निं केशी विषं केशी बिभर्ति रोदसी। केशी विश्वं स्वर्दृशे केशीदं ज्योतिरुच्यते ॥ - ऋ. १०.१३६.१

*अप्सरसां गन्धर्वाणां मृगाणां चरणे चरन्। केशी केतस्य विद्वान् त्सखा स्वादुर्मदिन्तमः ॥ वायुरस्मा उपामन्थत् पिनष्टि स्मा कुनन्नमा। केशी विषस्य पात्रेण यद्रुद्रेणापिबत् सह ॥ - ऋ.१०.१३६.६-७

*यः कृष्णः केश्यसुर स्तम्बज उत तुण्डिकः। अरायानस्या मुष्काभ्यां भंससोप हन्मसि ॥ - अथर्ववेद ८.६.५

*श्यावाश्वं कृष्णमसितं मृणन्तं भीमं रथं केशिनः पादयन्तम्। पूर्वे प्रतीमो नमो अस्त्वस्मै ॥ - अ. ११.२.१८

*यदीमे केशिनो जना गृहे ते समनर्तिषू रोदेन कृण्वन्तो३घम्। अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम् ॥ - अ. १४.२.५९

*राजाभिषेके केशवपनम् : ये केशिनः प्रथमाः सत्रमासत। येभिराभृतं यदितं विरोचते। तेभ्यो जुहोमि बहुधा घृतेन रायस्पोषेणेमं वर्चसा संसृजाथ। तैत्तिरीय ब्राह्मण २.७.१७.१

*अथ हाहीनसम् आश्वत्थिं केशी दार्भ्यः केशिनस् सात्यकामिनः पुरोधाया अपरुरोध। स ह स्थविरतरो ऽहीना आस कुमारतरः केशी। तं होवाचां केशिन् किं मे विद्वान् राजन्यम् उपाहृथा इति। स होवाच दहेद् अनुष्टुभम् एव सर्वाणि छन्दांस्य् उपास्महे बृहतीं पशून् यज्ञं स्वर्गं लोकम् इति। -- - - - - -  जैमिनीय ब्राह्मण १.२८५

*केशी ह दार्भ्यो दर्भपर्णयोर् दिदीक्षे। अथ ह सुत्वा याज्ञसेनो हंसो हिरण्मयो भूत्वा यूप उपविवेश। तं ह केशी शुनीति नाम्नाभ्युवाद। स ह चुक्रोध - स्थविरो ऽस्मि पञ्चालानां राजा। स उ वै दीक्षितो ऽस्मि। को नु मार्हेन् नाम्नैवाभिवदितुम् इति।- - - - - इष्टापूर्तस्य त्वम् अक्षितिं वेत्थ। दीक्षाम् अहं वेद। - - - - - - जै.ब्रा. २.५३

*एषा वै कैशिनी दीक्षा। एतां ह केशी दार्भ्यो दीक्षाम् उपनिषसाद। - जै.ब्रा. २.६८

*दर्भम् उ ह वै शातानीकिं पाञ्चाला राजानं सन्तं नापचायांचक्रुः। अपि ह स्मैनं कुमारा दर्भ दर्भेति ह्वयन्ति। तस्य हैतौ ब्राह्मणाव् आसतुर् अहीना आश्वत्थिः केशी सात्यकामिर् इति। - - - -यद् अप्य~ एतर्हि पाञ्चाला दर्भान् कुशा इत्य् एवाचक्षते। - जै.ब्रा. २.१००

*अथैष परिक्रीः। खण्डिकश् च हौद्भारिः केशी च दार्भ्यः पाञ्चालेषु पस्पृधाते। स ह खण्डिकःकेशिनम् अभिप्रजिघाय। सद्यःक्रिया वै स्यो यक्ष्यत इति। अथ हैतेन प्रोच्य भ्रातृव्याय यजन्ते। तस्य हैते ब्राह्मणा आसुर् - अहीना आश्वत्थिः, केशी सात्यकामिर् - - - -। - जै.ब्रा.२.१२२

*अवलम्ब उ ह वै ब्रह्मणः क्षत्रं च विट् च। क्षत्रं चो ह वै विशं चानु भ्रातृव्यलोकः। - - -अवलम्ब उ ह वा आत्मनो जाया च प्रजा च। जायां चो ह वै प्रजां चानु भ्रातृव्यलोकः। - जै.ब्रा. २.१२३

*ततो वै स खण्डिकं निःसारयांचकार। ततो वै केशी दार्भ्यो ऽभवत्, परा खण्डिकः। - जै.ब्रा. २.१२४

*संवत्सराद् एव तत् खण्डिकम् औद्भारिं केशी दार्भ्यो नुनुदे, संवत्सराद् अन्तरियाय। - जै.ब्रा. २.१२४

*अथैषो ऽन्तर्वसुः। खण्डिकश् च हौद्भारिः केशी च दार्भ्यः पाञ्चालेषु पस्पृधाते। स ह खण्डिकः केशिनम् अभिबभूव। स ह केशी खण्डिकेन निबाढ उच्चैःश्रवसं कौवयेयं जगाम कौरव्यं राजानं मातुर् भ्रातरम्। - - - - - -जै.ब्रा. २.२७९

*अथ यज्ञायज्ञीयम् उक्तब्राह्मणम्। - - - -तद् ध स्म केशी दार्भ्य उपगायति - सर्वदैव गिरौ भद्रम् अपि पर्णेन जीवति। यादवसं न विन्दति तदाशा उपधावति इति। - जै.ब्रा. ३.१६६

*तद् घैतं मीमांसांचक्रुर् आमलक अकूवयेयो ऽहीना आश्वत्थिः केशी दार्भ्यः - किं स्तोकं त्वम् आगच्छन्तं मन्यसे, किं स्तोकं त्वं, किं स्तोकं त्वम् इति। स होवाच केशी - घृतस्तोकम् अहं मन्य इति अथ होवाचाहीना - मधुस्तोकम् अहं मन्य इति। अथ होवाचामलक - उदस्तोकम् अहं मन्य इति। - जै.ब्रा.३.३५०

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