Puraanic contexts of words like Krishnaa, Krishnaajina, Ketaki, ketu, Ketuman, Ketumaala etc. are given here.

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कृष्णसूत्र ब्रह्माण्ड ३.४.२.१५० ( घोर नरकों में से एक ), वायु १०१.१४९ ( वही) ।

कृष्णा पद्म ६.१११.३ ( स्वरा द्वारा शापित विष्णु के कृष्णा नदी रूप होने का कथन ), ६.१११.८६ ( सावित्री के शाप से विष्णु के कृष्णा नदी बनने का उल्लेख ), भागवत १.७.१४( द्रौपदी का एक नाम ), १०.२.१२ ( योगमाया का एक नाम ), वामन ९०.२( कृष्णा तीर्थ में विष्णु का हयशीर्ष नाम से वास ), वायु ४५.१०४ ( सह्य पर्वत से नि:सृत दक्षिणापथ की अनेक नदियों में से एक ), ६९.१७० ( खशा की सात पुत्रियों में से एक ), विष्णुधर्मोत्तर ३.४७.१( संसार में सारी विकृति के कृष्णा होने तथा संसार की पालक होने का उल्लेख ),३.४७.३( कृष्ण की वनमाला के कृष्णा होने का उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण १.३८५.४३( कृष्ण-पत्नी कृष्णा का कार्य), १.४२४.२०( कृष्णा के नाश हेतु कृष्ण का उल्लेख ), २.८०.७६ ( राजा बलेशवर्मा की तीन पुत्रियों में से एक, कृष्णा द्वारा वनेचर रूप धारी कृष्ण नारायण को स्वमांस प्रदान करने का उल्लेख ), २.८१ ( बलेश्वर- पुत्री कृष्णा का कृष्णा नदी रूप से स्थित होना, कृष्णा के तप पर श्री हरि का कृष्णानिवास नाम से विराजित होने का कथन ) । krishnaa

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कृष्णाङ्गना वायु ३४.८७ ( चतुर्थ दिग्देश में विरूपाक्ष की कृष्णाङ्गना नामक सभा का उल्लेख ) ।

 

कृष्णाङ्गमणिपुञ्जक वायु ४४.१० ( केतुमाल के अनेक जनपदों में से एक ) ।

 

कृष्णाजिन भविष्य ४.१८८ ( कृष्णाजिन दान विधि का वर्णन ), मत्स्य ४७.८६ ( असुरों का कृष्णाजिन धारणकर काव्य - माता के पास गमन ), ८२.३ ( गुडधेनु - दान विधि में ४ हाथ लम्बे कृष्णाजिन को बिछाने का उल्लेख ), २०४.११ ( श्राद्ध कर्म में कृष्णाजिन दान की प्रशस्तता का उल्लेख ), २०६ ( कृष्णाजिन दान विधि व माहात्म्य ), २४५.८५ ( ब्रह्मा द्वारा वामन रूपधारी विष्णु को कृष्णाजिन प्रदान करने का उल्लेख ), २७९.५ ( कामधेनु दान विधि में कृष्णाजिन के ऊपर एक प्रस्थ गुड तथा स्वर्णनिर्मित धेनु की स्थापना का उल्लेख ), वायु २५.३४ ( कमलनाल के सहारे रसातल में पहुंच जाने पर ब्रह्मा द्वारा जल के भीतर कृष्णाजिन व उत्तरीय धारी विष्णु के दर्शन ), २५.८१ ( कृष्णाजिन - विभूषित ब्रह्मा द्वारा मन, भूतों आदि की सृष्टि का कथन ), ३०.२२१ ( कृष्णाजिनोत्तरीय : दक्ष - कृत महादेव स्तुति में महादेव का एक नाम ), ७४.४ ( पितृकार्य में कृष्णाजिन के सान्निध्य, दर्शन अथवा दान की प्रशस्तता का उल्लेख ), ९९.४१० ( कलियुग के अन्त में विपत्तिग्रस्त प्रजा के कृष्णाजिन धारण का उल्लेख ), विष्णु १.११.३१ ( पितृगृह से निर्गत ध्रुव द्वारा वन में कृष्णाजिनों पर आसीन सप्तर्षियों के दर्शन ), ६.६.२० ( कृष्णाजिन धारी राजा केशिध्वज का प्रायश्चित्त पृच्छा हेतु खाण्डिक्य के समीप गमन ), विष्णुधर्मोत्तर ३.४२.४ ( ऋषियों के रूप निर्माण में उन्हें कृष्णाजिन - उत्तरासंग युक्त दिखाने का निर्देश ), ३.३०१.३१( कृष्णाजिन प्रतिग्रह की संक्षिप्त विधि ), लक्ष्मीनारायण १.५१२.३७( अवभृथ स्नान के समय इन्द्र द्वारा गजारूढ होकर मृगचर्म फेंकने का कथन ) । krishnaajina

 

कृष्णाष्टमी मत्स्य ५६.१-११ ( कृष्णाष्टमी व्रत विधि तथा माहात्म्य का वर्णन : कृष्णपक्ष की प्रत्येक अष्टमी को शङ्कर की पूजा बारह मासों में बारह नामों से करने का कथन ) ।

 

केकय महाभारत महाभारत विराट दाक्षिणात्य पृष्ठ १८९३(राजा केकय के सूतों के अधिपति होने का कथन, मालवी – द्वय पत्नियों से कीचक पुत्रों व सुदेष्णा कन्या के जन्म का कथन), शान्ति ७७(राक्षस द्वारा अपहृत होने पर कैकेयराज का राक्षस से संवाद), वायु ९९.२३/२.३७.२४ ( शिबि के ४ पुत्रों में से एक, तुर्वस्वादि वंश ), विष्णुधर्मोत्तर ३.१२१.५( केकय देश में भरत की पूजा का निर्देश ), द्र. कैकय kekaya

 

केकरी मत्स्य १७९.१८ ( अन्धकासुर के रक्त पानार्थ शिव द्वारा सृष्ट मानस मातृकाओं में से एक ) ।

 

केका ब्रह्म १.३४.७१( मन्त्र ध्वनि से हर्षित मयूरों द्वारा केका ध्वनि करने का उल्लेख ), वामन १.१७(बर्हिणों द्वारा केकारव करने का उल्लेख), महाभारत आश्रमवासिक ३४.१०(नीलकण्ठ द्वारा केकारव करने का उल्लेख) ।

 

केतकी गर्ग २.२०.३२ ( कुमुद वन में कृष्ण का शृङ्गार करते हुए राधा द्वारा उन्हें मोहिनी, मालिनी, कुन्द व केतकी पुष्पों से निर्मित हार धारण कराने का उल्लेख ), देवीभागवत ५.३३.३४ ( ब्रह्मा व विष्णु की लिङ्ग - अन्त दर्शन की स्पर्द्धा में केतकी पुष्प द्वारा ब्रह्मा के पक्ष में मिथ्या साक्षी, शिव पूजा में केतकी पुष्प के वर्जित होने का वृत्तान्त ), १२.६.३५ ( गायत्री सहस्रनामों में से एक ), नारद १.९०.७२( केतकी पुष्पों द्वारा देवी पूजा से वाहन सिद्धि का उल्लेख ), पद्म १.२८.३१ ( केतकी पुष्प का शत्रुनाशक रूप में उल्लेख ), ६.१२१.१३ ( केतकी पुष्पों से केशवार्चन का माहात्म्य ), स्कन्द १.१.६.३७ ( ब्रह्मा द्वारा लिङ्ग के मस्तक के अन्वेषण के विषय में सुरभि व केतकी द्वारा मिथ्या साक्षी, आकाशवाणी द्वारा केतकी को शिवपूजा में अयोग्यता रूप शाप देने का वर्णन ), ७.३.३४.२२ ( ब्रह्मा के पक्ष में मिथ्या साक्षी से केतकी पुष्प को शाप प्राप्ति का वृत्तान्त ) । ketaki / ketakee

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केतन ब्रह्माण्ड ३.४.२८.१०४ ( विशुक्र के रथ - सारथि केतन का श्यामला द्वारा वध का उल्लेख ) ।

 

केतव वायु ६०.६६ ( ऋग्वेद शाखा प्रवर्तक रथीतर के चार शिष्यों में से एक ) ।

 

केतु पद्म ६.५.९० ( जालन्धर व इन्द्र के युद्ध में केतु के वैश्वानर के साथ युद्ध का उल्लेख ), ब्रह्माण्ड १.२.२३.९० ( केतु के रथ के पलाल व धूम्रवर्णीय अष्ट अश्वोंसे युक्त होने का उल्लेख ), १.२.२४.१३९ ( केतुग्रहों में धूमकेतु के आदि होने का उल्लेख ), भविष्य ३.४.१२.३४(सुमेरु के सार से केतु के निर्माण का उल्लेख), ३.४.१७.४९ ( ध्रुव व वासुदेवी से केतु ग्रह की उत्पत्ति का उल्लेख ), ३.४.२५.४२ ( विष्णुयशा नामक द्विज के गृह में श्री हरि के प्रादुर्भूत होने पर समस्त देवों द्वारा श्रीहरि की स्तुति के क्रम में केतु द्वारा स्तुति तथा स्वयं की ब्रह्माण्ड गुह्य से उत्पत्ति का कथन ; केतु द्वारा भौत मन्वन्तर की सृष्टि का उल्लेख ), भागवत ५.४.१० ( ऋषभदेव के १०० पुत्रों में से एक ), ५.२३.७ ( शिशुमार चक्र वर्णन में शिशुमार के समस्त अङ्गों में केतुओं की स्थिति का उल्लेख ), ६.६.३७ ( सिंहिका व विप्रचित्ति के १०१ पुत्रों में से ज्येष्ठ का राहु तथा शेष सौ पुत्रों का केतु नाम से उल्लेख ), ८.१.२७ ( चतुर्थ तामस मनु के दस पुत्रों में से एक ), मत्स्य ६.१८ ( कश्यप व दनु के १०० दानव पुत्रों में से एक ), ४८.६ ( ययाति - पुत्र द्रुह्यु के दो पुत्रों में से द्वितीय ), ९३.१२ ( लोकहितकारी नौ ग्रहों में केतु का उल्लेख, नवग्रह शान्ति विधि का वर्णन ), ९३.१५( केतु के अधिदेवता चित्रगुप्त तथा राहु के अधिदेवता काल होने का उल्लेख ), ९३.६२( राहु के लिए आयस तथा केतु के लिए छाग दान का निर्देश ), ९४.८( केतुओं के स्वरूप का कथन : धूम्र, द्विबाहु, विकृतानन, गृध्रासनगत आदि ), १२८.६५( केतु ग्रह के मण्डल का आपेक्षिक मान ), १२७.११ ( ग्रहों के रथ वर्णन में केतु के रथ के धूम्रवर्णीय अष्ट अश्वों से युक्त होने का उल्लेख ), वायु ३५.४४ ( केतुवृक्ष : केतुमाल वर्ष के पार्श्व में स्थित वट वृक्ष का केतुवृक्ष के रूप में उल्लेख ), ५२.८२ ( ग्रहों के रथों के वर्णन में केतु के रथ के धूम्र तथा धूसर वर्णीय ६४ अश्वों से युक्त होने का उल्लेख ), ५३.१११ ( केतुग्रहों में धूमकेतु के आदि होने का उल्लेख ), ८८.१४९/२.२६.१४८( बर्हिकेतु व सुकेतु : कपिल की क्रोधाग्नि से सुरक्षित बचे सगर के ४ पुत्रों में से २ ), विष्णु २.२.१९ ( मेरु के चतुर्दिक पर्वतों पर जम्बू आदि वृक्षों का पर्वत केतुओं के रूप में नामोल्लेख ), २.१२.२३ ( केतु के रथ के पलाल तथा धूम्रवर्णीय आठ अश्वों से युक्त होने का उल्लेख ), विष्णुधर्मोत्तर १.१०६.१०४( मृत्यु के नि:श्वास से केतु गृह की उत्पत्ति की कथा ), शिव २.५.८.१३(मोक्ष का शिव के रथ में ध्वज बनना), स्कन्द ३.१.७.७१( राम द्वारा स्थापित सेतु के केतु रूप होने का उल्लेख ), ५.१.४४.२०( राहु के अमृत पी लेने पर विष्णु द्वारा चक्र से राहु के शिर का छेदन, सुधा पान से राहु की अमरता तथा चक्र छेदन से दो भागों की राहु - केतु के रूप में प्रसिद्धि ), ५.२.४४.३३ ( केतुग्रह द्वारा वासव / इन्द्र को पीडित करने का उल्लेख ), ६.२५२.३८( चातुर्मास में केतु की दर्भ में स्थिति का उल्लेख ), महाभारत कर्ण ८७.९२( अर्जुन व कर्ण की ध्वजाओं की राहु - केतु से उपमा ), लक्ष्मीनारायण १.४४१.९१ ( केतु नामक देव के दर्भ रूप में अवतरण का उल्लेख ), २.१८४.७९ ( अल्पकेतु : श्री हरि के राजा अल्पकेतु की जीवनी नामक नगरी में आगमन का वर्णन ); द्र. अल्पकेतु, उरलकेतु, ग्रह, चन्द्रकेतु, चित्रकेतु, जीमूतकेतु, तालकेतु, तिग्मकेतु, दण्डकेतु, दीप्तिकेतु, धर्मकेतु, धृष्टकेतु, पातालकेतु, पुण्ड्रकेतु, मकरकेतु, माल्यकेतु, यज्ञकेतु, वज्रकेतु, विश्वकेतु, वीरकेतु, श्वेतकेतु, सत्यकेतु, सिंहकेतु, सुकेतु, हंसकेतु, ketu

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केतु - पद्म ६.१२.३८ ( दैत्यों और शिव गणों के युद्ध में जालन्धर - सेनानी केतुमुख का शुभ्र के साथ युद्धोल्लेख ), ब्रह्माण्ड २.३.६.६ ( केतुवीर्य : कश्यप व दनु के १०० दानव पुत्रों में से एक ), मत्स्य ६.१८ ( केतुवीर्य : कश्यप व दनु के १०० दानव पुत्रों में से एक ), लिङ्ग १.४९.२८( ४ पर्वतों पर उत्पन्न कदम्ब आदि वृक्षों की द्वीपकेतु संज्ञा ), वायु ३५.२० ( मन्दर पर्वत के शृङ्ग पर स्थित एक महावृक्ष ), वा.रामायण ७.५.३८ ( केतुमती : नर्मदा - पुत्री, सुमाली - पत्नी, प्रहस्त, अकम्पन आदि १० पुत्रों तथा राका, पुष्पोत्कटा, कैकसी व कुम्भीनसी नामक ४ पुत्रियों की माता ), विष्णु ३.१.१९ ( केतुरूप : तामस मनु के चार पुत्रों में से एक ),

 

केतुमान् ब्रह्माण्ड १.२.११.४२ ( मार्कण्डेयी द्वारा पश्चिम दिशा में राजन, केतुमान् और प्रजापति को उत्पन्न करने का उल्लेख ), भागवत ९.६.१ ( अम्बरीष के तीन पुत्रों में से एक ), वायु २८.३७ ( रज व मार्कण्डेयी - पुत्र, प्रतीची दिशा में आश्रय प्राप्त करने का उल्लेख ), विष्णु १.२२.१३ ( लोकपितामह द्वारा रजि - पुत्र केतुमान् को पश्चिम दिशा का लोकपाल बनाने का उल्लेख ), २.८.८३ ( लोकालोक पर्वत पर स्थित चार लोकपालों में से एक ), शिव ३.४.१२ ( द्वितीय द्वापर में सुतार नाम से शिव के अवतार ग्रहण करने पर चार शिष्यों में से एक ), ३.५.२९ ( इक्कीसवें द्वापर में दारुक नाम से शिव के अवतार ग्रहण करने पर चार पुत्रों में से एक ), ७.२.९.१८ ( शिव के योगाचार्य शिष्यों में से एक ), हरिवंश १.४.२० ( पृथु द्वारा रजस् - पुत्र केतुमान् का पश्चिम दिशा के दिक्पाल पद पर  अभिषेक का उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण १.२४१.२४ ( सौराष्ट्र के अन्तर्गत भद्रावती नगर के राजा केतुमान् को पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी व्रत के प्रभाव से पुत्र प्राप्ति का वृत्तान्त ) । ketumaan

 

केतुमाल गर्ग ७.३१ ( केतुमाल वर्ष में प्रद्युम्न का आगमन, केतुमाल वासियों द्वारा कृष्ण का गुणगान, प्रजापति व्यति संवत्सर द्वारा भेंट का वर्णन ), देवीभागवत ८.९.१० ( केतुमाल वर्ष में लक्ष्मी द्वारा कामदेव रूपी हरि की स्तुति ), ब्रह्म १.१६.४५( लोकशैल/मेरु? के ४ पत्रों में से एक ), भागवत ५.२.१९( आग्नीध्र के ९ पुत्रों में से एक, देववीति - पति ), ५.१८.१५ ( केतुमाल वर्ष में भगवान् की कामदेव रूप से स्थिति तथा संवत्सर प्रजापति के पुत्रों, पुत्रियों द्वारा काम की उपासना ), वराह ७७.२५-२७ ( अश्वत्थ वृक्ष के केतु स्वरूप होने तथा माला से युक्त होने के कारण केतुमाल वृक्ष नाम से प्रसिद्धि, केतुमाल वृक्ष से चिह्नित होने के कारण उस वर्ष की केतुमाल वर्ष नाम से प्रसिद्धि का कथन ), वाय ३५.३८(अश्वत्थ वृक्ष के केतु पर इन्द्र - प्रदत्त माला की विराजमानता से द्वीप का केतुमाल नाम धारण),३५.४१( पश्चिम में विस्तृत द्वीप की ही केतु स्वरूप वृक्ष तथा माला से चिह्नित होने के कारण केतुमाल नाम से प्रसिद्धि का उल्लेख ), ४४.१ ( केतुमाल देश के पर्वतों, नदियों तथा निवासियों का वर्णन ), लक्ष्मीनारायण २.१६४.९६ ( श्रीहरि द्वारा वृकायन तथा नीलकर्ण प्रभृति स्वभक्तों का माल्यवान् के पश्चिम में स्थित केतुमाल नामक महादेश में प्रेषण का कथन ), २.१७०.५८ ( श्रीकृष्ण के आगमन से केतुमाल देश की सार्थकता का कथन ), २.२९७.९७ ( केतुमालीय पत्नियों के गृहों में राजभूषा धारण करते हुए श्रीकृष्ण के दर्शन का उल्लेख ), ३.१२२.५७( केतुमाल में माताओं द्वारा कुमारी के दान का उल्लेख ), कथासरित् ८.५.७७ ( श्रुतशर्मा द्वारा केतुमालेश्वर क्षेत्र में उत्पन्न अश्विनी - पुत्रों दम और नियम नामक विद्याधरों को प्रभास से युद्ध हेतु प्रेषण का उल्लेख ) । ketumaala

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