Puraanic contexts of words like Kulika, Kulisha, Kuvalayapeeda, Kuvalayaashva, Kusha etc. are given here.
कुलिक गरुड १.१९७.१३ ( अग्नि मण्डल में कुलिक सर्प की स्थिति का उल्लेख ), भविष्य १.३४.२३( कुलिक नाग का शनि ग्रह से तादात्म्य ), भागवत ५.२४.३१( वासुकि आदि महानागों में से एक कुलिक के पाताल में निवास का उल्लेख ), शिव ७.२.९.२० ( शिव के योगाचार्य शिष्यों में से एक ), स्कन्द ५.३.३४.५ ( कुलिक कुल के ब्राह्मण द्वारा रवि तीर्थ में रवि की उपासना, प्रसन्न रवि द्वारा ब्राह्मण को वर प्रदान तथा तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन ), लक्ष्मीनारायण २.१७६.९२ ( शुभ कर्म में कुलिक योग रूप मुहूर्तों को त्यागने का उल्लेख ), ३.१४२.१२ ( कुलिक ग्रह होने पर कुलिक जाति के सर्पदंशन से मृत्यु का उल्लेख ) । kulika
कुलिन्द गर्ग १०.५१.४१ (माता -पिता के बाल्यावस्था में ही परलोकवासी होने से कुलिन्द द्वारा कुन्तलपुर के राजा तथा केरल नरेश - पुत्र चन्द्रहास के लालन पालन का उल्लेख ), महाभारत कर्ण ८५ ।
कुलिश नारद २.५२.१९ ( शस्त्रों में कुलिश की श्रेष्ठता के समान तीर्थों में पुरुषोत्तम तीर्थ की श्रेष्ठता का कथन ), मत्स्य २५३.२४ ( वास्तु निर्माण में पूजित बत्तीस बाह्य देवताओं में कुलिशायुध इन्द्र का उल्लेख ), विष्णुधर्मोत्तर १.४२.४( पार्वती के मध्य भाग की कुलिश से उपमा ), स्कन्द ४.१.११.१३८ ( कुलिश नामक आयुध धारण करने वाले इन्द्र का मुनिकुमार को वर देने हेतु उपस्थित होना, मुनिकुमार के इन्द्र से वर ग्रहण हेतु मना करने पर इन्द्र के क्रुद्ध होने तथा कुलिश आयुध उठाकर बालक को भयभीत करने का कथन ) । kulisha
कुलूत महाभारत द्रोण १०४.६, कर्ण १२.३५
कुलोत्तीर्णा ब्रह्माण्ड ३.४.१९.३५ ( ललिता देवी के चक्रराज रथेन्द्र के पांचवें पर्व पर कुलोत्तीर्णा नाम से प्रथित देवियों के स्थित होने का उल्लेख ) ।
कुल्य ब्रह्माण्ड २.३.७४.६ ( भाण्डीर के ४ पुत्रों में से एक कुल्य के नाम पर कुल्य देश के नामकरण का उल्लेख ), भागवत १२.६.७९ ( पौष्यंजि के ५ शिष्यों में से एक ), वायु ९९.६ ( जनापीड के ४ पुत्रों में से एक कुल्य के नाम पर कुल्य देश के नामकरण का उल्लेख ) ; द्र. आर्यकुल्या, देवकुल्या, द्रुमकुल्या ।
कुवलय वामन ५७.८० ( कुहू द्वारा कुमार को कुवलय नामक गण प्रदान करने का उल्लेख ), ९०.१८ ( कुवलय तीर्थ में विष्णु का वीर नाम से वास? ), विष्णु ४.८.१५ ( कुवलय नामक अश्व को प्राप्त करने के कारण राजा ऋतध्वज के कुवलयाश्व नाम से प्रथित होने का उल्लेख ), कथासरित् ३.६.४९ (कुवलयावली : राजा आदित्यप्रभ द्वारा देवपूजा में संलग्न दिगम्बरा रानी कुवलयावली के दर्शन का उल्लेख ), ३.६.१८६ ( रानी कुवलयावली का राजा आदित्यप्रभ से डाकिनी मन्त्रों से प्राप्त सिद्धियों का वर्णन ), १८.२.२७८ ( विक्रमादित्य द्वारा कोंकण प्रदेश की श्याम वर्णा घोडी कुवलयमाला को राजा कीर्तिवर्मा को प्रदान करने का उल्लेख ) । kuvalaya
कुवलयपीड गर्ग ५.७.१७ ( कृष्ण द्वारा कुवलयापीड हस्ती के वध का वर्णन ), ५.११.१२+ ( बलि - पुत्र मन्दगति दैत्य का त्रित मुनि के शाप से कुवलयपीड हस्ती बनना , श्रीकृष्ण द्वारा वध से मुक्ति का वृत्तान्त ), देवीभागवत ४.२२.४६ ( कुवलय नामक हस्ती के रूप में दिति - पुत्र अरिष्ट के अंशावतरण का उल्लेख ), ब्रह्म १.८५.३० ( कुवलयपीड नामक हस्ती का वध करके गजदन्तों को शस्त्र रूप से हाथ में धारण किए हुए कृष्ण - बलराम के रङ्गशाला में प्रवेश का कथन ), ब्रह्माण्ड २.३.७३.१०० ( वृष्णि कुल में उत्पन्न विष्णु द्वारा कुवलयापीड हस्ती के वध का उल्लेख ), भविष्य ३.३.२४.३५ ( जयचन्द्र द्वारा त्यक्त कुवलयापीड गजों का उदयसिंह व आह्लाद वीरों द्वारा लीला पूर्वक वध का उल्लेख ), भागवत १०.३६.२५ ( कंस द्वारा महामात्र/ महावत को कृष्ण - बलराम के वध हेतु रङ्गशाला के द्वार पर कुवलयापीड हस्ती को रखने का आदेश ), १०.४३.२( श्रीकृष्ण द्वारा कुवलयापीड के उद्धार का वृत्तान्त ), वायु ९८.१०१ ( वृष्णिकुलोत्पन्न विष्णु द्वारा कुवलयापीड हस्ती के वध का उल्लेख ), विष्णु ५.१५.११,१७ ( कुवलयापीड हस्ती के द्वारा कृष्ण - बलराम के वध हेतु कंस की योजना का उल्लेख ), ५.२०.३२ ( बलराम के रङ्गद्वार पर उपस्थित होने पर वहां स्थित कुवलयापीड नामक हाथी का महावत द्वारा प्रेरित होने पर कृष्ण - बलराम को मारने हेतु दाब्डना , कृष्ण द्वारा कुवलयापीड के वध का वृत्तान्त ), हरिवंश २.२९.१७ ( कंस द्वारा कुवलयापीड नामक हस्ती को रङ्गशाला के द्वार पर स्थित रहने का आदेश, हस्ति का कृष्ण - बलराम के रङ्गशाला में आगमन को अवरुद्ध करना, कृष्ण द्वारा कुवलयापीड के वध का वृत्तान्त ), कथासरित् १६.३.१९ ( शिबि - वंशीय चन्द्रावलोक नामक राजा के पास शत्रुसेनाविर्मदक कुवलयापीड नामक हस्ती के होने का उल्लेख ), कृष्णोपनिषद १४( दर्प के कुवलयपीड होने का उल्लेख ) । kuvalayapeeda
कुवलयाश्व देवीभागवत ७.९.३५ (बृहदश्व - पुत्र, दृढाश्व - पिता, धुन्धु नामक दैत्य के वध से कुवलयाश्व के धुन्धुमार नाम से विख्यात होने का उल्लेख ), ब्रह्म १.५.७१ ( उत्तङ्क ऋषि की प्रार्थना पर बृहदश्व - पुत्र कुवलाश्व द्वारा पुत्रों सहित धुन्धु दैत्य का अन्वेषण तथा वध, उत्तङ्क द्वारा कुवलाश्व को अपराजेयता , धर्मरति, स्वर्गवास तथा मृत पुत्रों को अक्षय लोकों की प्राप्ति रूप वर प्रदान ), ब्रह्माण्ड २.३.६३.२९ ( बृहदश्व - पुत्र कुवलाश्व द्वारा धुन्धु राक्षस के वध का वृत्तान्त ), भागवत ९.६.२१ ( बृहदश्व - पुत्र कुवलयाश्व द्वारा उत्तङ्क ऋषि के प्रियार्थ धुन्धु दैत्य का वध तथा धुन्धुमार नाम धारण ), मत्स्य १२.३१ ( इक्ष्वाकुवंशीय बृहदश्व - पुत्र, दृढाश्व, दण्ड और कपिलाश्व - पिता, धुन्धु दैत्य का वध करने से कुवलाश्व की धुन्धुमार नाम से प्रसिद्धि का उल्लेख ), मार्कण्डेय २०.५१/ १८.५१ ( गालव ऋषि द्वारा आकाश से अनायास पतित कुवलयाश्व अश्व को शत्रुजित् नामक राजा को प्रदान करना, राजपुत्र ऋतध्वज द्वारा कुवलयाश्व की सहायता से दानव के वध का कथन ), वामन ५९.११( पातालकेतु नामक दैत्य के वध तथा मदालसा नामक स्वपुत्री की दैत्य से मुक्ति हेतु विश्वावसु नामक गन्धर्व द्वारा ऋतध्वज - पुत्र कुवलयाश्व को अश्व अर्पित करने का कथन ), वायु ६८.३१ ( उत्तङ्क के वचनानुसार कुवलाश्व द्वारा अरूरु के पुत्र तथा दनायुषा के पौत्र धुन्धु महासुर के वध का उल्लेख ), ८८.२८ ( बृहदश्व - पुत्र कुवलाश्व द्वारा धुन्धु वध से धुन्धुमार नाम प्राप्ति का वृत्तान्त ), विष्णु ४.२.३९ ( बृहदश्व - पुत्र, उदक महर्षि को पीडित करने वाले दुन्दु राक्षस के वध से दुन्दुमार नाम धारण , दुन्दु से युद्ध में कुवलयाश्व के केवल तीन पुत्रों के जीवित रहने तथा सहस्र पुत्रों के दुन्दु के मुख की नि:श्वासाग्नि से भस्म हो जाने का कथन ), विष्णुधर्मोत्तर १.१६.१० ( बृहदश्व - पुत्र, उत्तङ्क की प्रेरणा से कुवलाश्व द्वारा धुन्धु दैत्य का वध, धुन्धुमार उपनाम का कथन ), हरिवंश १.११.२३ ( बृहदश्व - पुत्र, उत्तङ्क ऋषि के कहने पर राजा बृहदश्व का धुन्धु दैत्य के वध हेतु स्वपुत्र कुवलाश्व को ऋषि की सेवा में अर्पित करना, कुवलाश्व द्वारा दैत्य वध होने पर धुन्धुमार नाम धारण करने तथा उत्तङ्क द्वारा वर प्रदान करने का वर्णन ), लक्ष्मीनारायण १.५६९.६ ( कुवलयाश्व : कुरुक्षेत्र की अपेक्षा नर्मदा के माहात्म्य को प्रदर्शित करने हेतु राजा कुवलयाश्व व राजा मुचुकुन्द की कथा ; नर्मदा में स्नान, तप व दान से राजा मुचुकुन्द को कुवलयाश्व की अपेक्षा उच्चतर लोक की प्राप्ति ), ३.९४.६५ ( इक्ष्वाकु वंश के राजा कुवलाश्व द्वारा धुन्धु राक्षस के वध का वृत्तान्त ) । kuvalayaashva
कुश अग्नि १८.११ (अङ्गात्सुनीथापत्यं वै वेणमेकं व्यजायत । अरक्षकः पापरतः स हतो मुनिभिः कुशैः ॥), १८.२१ (प्राचीनाग्राः कुशास्तस्य पृथिव्यां यजतो यतः । प्राचीनबर्हिर्भगवान्महानासीत्प्रजापतिः ॥), २४.२७ ( अखण्डिताग्रौ निर्गर्भौ कुशौ प्रादेशमात्रकौ । ताभ्यामुत्तानपाणिभ्यामङ्गुष्ठानामिकेन तु ॥), २७.५( नारायणान्तैः सम्प्रोक्ष्य कुशाग्रैस्तेन तां भुवं। विकिरान्वासुदेवेन क्षिपेदुत्तानपाणिना ॥), ३१.४६( शान्तिरस्तु शिवञ्चास्तु दुष्टमस्य प्रशाम्यतु । वासुदेवशरीरोत्थैः कुशैर्निर्मथितं मया।.. अयं हरिः कुशो विष्णुर्हता रोगा मया तव ॥.), ३४.२९( प्रणीताप्रोक्षणीपात्रे न्यसेत्प्रागग्रगं कुशम् ।), ४०.८( वास्तुपुरुष - पुष्पदन्तं कुशस्तम्बैः पद्मैर्वरुणमेकतः ॥), ५७.२१( ८१पद - यवं सिद्धार्थकं गन्धं कुशाग्रं चाक्षतं तथा । तिलान् फलं तथा पुष्पमर्घ्यार्थं पूर्वतो न्यसेत् ॥), ५८.८( ततः शुक्लानि पुष्पाणि घृतं सिद्धार्थकं तथा ॥ दूर्वां कुशाग्रं देवस्य दद्याच्छिरसि देशिकः ।), ७२.४५ (दक्षस्कन्धोपवीती च कुशमूलाग्रतस्तिलैः ), ७४.७७ (चर्मणावेष्टितं खड्गं रक्षितं कुशपुष्पकैः ), ७५.१ (यागोपकरणं सर्वं दिव्यदृष्ट्या च कल्पयेत् ॥ उदङ्मुखः कुण्डमीक्षेत्प्रोक्षणं ताडनं कुशैः ।), ७५.०२६ (प्रताप्याग्नौ त्रिधा दर्भमूलमध्याग्रकैः स्पृशेत् । कुशस्पृष्टप्रदेशे तु आत्मविद्याशिवात्मकं ॥), ७८.४२ (अगुरुं निर्ऋताशायां वायव्यां च चतुःसमं । होमद्रव्याणि सर्वाणि सद्योजातैः कुशैः सह ॥), ८१.१५ (तिलतण्डुलसिद्धार्थ कुशदूर्वाक्षतोदकं ॥ सयवक्षीरनीरञ्च विशेषार्घ्यमिदन्ततः ।), ९३.३०(यजेद्वा सकलं वास्तुं कुशदध्यक्षतैर्जलैः ॥), ९६.११४ (कुशमध्याग्रयोगेन लिङ्गमध्याग्रकं स्पृशेत् ।), १०७.४( वपुष्मते शाल्मलञ्च ज्योतिष्मते कुशाह्वयं । क्रौञ्चद्वीपं द्युतिमते शाकं भव्याय दत्तवान् ॥), ११५.४०( एको मुनिः कुम्भकुशाग्रहस्त आम्रस्य मूले सलिलन्ददाति । आम्नाय सिक्ताः पितरश्च तृप्ता एका क्रिया द्व्यर्थकरी प्रसिद्धा ॥), ११७.२७( स्वधावाचनीयान् कुशानास्तीर्य सपवित्रकान्(३) ॥ स्वधां वाचयिष्ये पृच्छेदनुज्ञातश्च वाच्यतां ।), ११९.११ (कुशद्वीप - अधिपति ज्योतिष्मान् के पुत्रों तथा पर्वतों का नामोल्लेख ), १६३.३( पाणिप्रक्षालनं दत्त्वा विष्टरार्थं कुशानपि ॥ आवाहयेदनुज्ञातो विश्वे देवास इत्यृचा ।), १६३.७( द्विगुणांस्तु कुशान् कृत्वा ह्युशन्तस्त्वेत्यृचा पितॄन् । आवाह्य तदनुज्ञातो जपेदायान्तु नस्ततः ॥), १६४.८( अर्कः पालाशः खदिरो ह्यपामार्गोथ(१) पिप्पलः । उदुम्बरः शमी दूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात् ॥), २०२.२२( पार्थिवं कुशमूलाद्यं वायव्यं गन्धचन्दनं ।), २४७.३ ( वास्तुलक्ष्म - कुशैः शरैस्तथाकाशैर्दूर्वाभिर्या च संश्रिता ।), २७३.१२( रेवस्य रैवतः पुत्रः ककुद्मी नाम धार्मिकः ॥ज्येष्ठः पुत्रशतस्यासीद्राज्यं प्राप्य कुशस्थलीम् ।.. कृतां द्वारवतीं नाम बहुद्वारां मनोरमाम् ।), २७३.३६( अतिथिश्च कुशाज्जज्ञे निषधस्तस्य चात्मजः ॥), २७८.२९( मत्स्यकाली कुशाग्रोऽतो ह्यासीद्राज्ञो वृहद्रथात् । कुशाग्राद्वृषभो जज्ञे तस्य सत्यहितः सुतः ॥), ३७३.१९ ( जलबिन्दुं कुशाग्रेण मासे मासे पिबेत्तु यः । संवत्सरशतं साग्रं प्राणयामश्च तत्समः ॥), कूर्म १.४९.२० ( कुशद्वीप के पर्वतों , नदियों तथा निवासियों का कथन ), गणेश २.१०९.२८ ( मुनि - पुत्रों द्वारा अभिमन्त्रित कुशों से दैत्यों का वध ), गरुड १,४३.९ (कुशसूत्र द्विजानां स्याद्राज्ञा कौशेयपट्टकम्॥ वैश्यानां चीरणं क्षौमं शूद्राणां शणवल्कजम्।..), १.५६.८ ( ज्योतिष्मान् के ७ पुत्रों से अधिष्ठित कुशद्वीप के पर्वतों तथा नदियों का नामोल्लेख ), १,१०७.३२ (प्रवासे तु मृते भूयः कृत्वा कुशमयं दहेत्॥), १,२१९.२ (जातपुत्रमुखदर्शनादौ वृद्धि श्राद्धं पूर्वाभिमुखेषु दक्षिणोपवीतिषु सयवबदरकुशैर्देवतीर्थेन नमस्कारान्तेन दक्षिणोपचारेण कर्तव्यम्॥), २.२९.२० (दर्भ का कुश से तादात्म्य - अपसव्यादितो ब्रह्मा दर्भमध्ये तु केशवः । दर्भाग्रे शङ्करं विद्यात्त्रयो देवाः कुशे स्थिताः ॥), २.२९.२२(पिण्डों में कुश के निर्माल्य बनने का उल्लेख - कुशाः पिण्डेषु निर्माल्याः ब्राह्मणाः प्रेतभोजने ।), २.३२.११३/२.२२.५९ (कुशद्वीप की शरीर के मांस में स्थिति का उल्लेख - कुशद्वीपः स्थितो मांसे क्रौञ्चद्वीपः शिरास्थितः ॥ ), ३.२८.२६(कुश नाम का कारण - वाल्मीकिऋषिणा यस्मात्कुशेनैव विनिर्मितः । अतः कुश इति प्रोक्तो जानकीनन्दनः प्रभुः ॥ ), ३.२८.५५(कान्तिमती – पति), देवीभागवत ८.४.२३ (घृतोदक से उपवेष्टित कुशद्वीप के स्वामी के रूप में प्रियव्रत - पुत्र हिरण्यरेता का उल्लेख - कुशद्वीपेऽतिरम्ये च घृतोदेनोपवेष्टिते । हिरण्यरेता राजाभूत्प्रियव्रततनूजनिः ॥), नारद १.६६.९२( मातृका न्यास के संदर्भ में कुशी विष्णु की शक्ति विश्वा का उल्लेख - पाशी विरजया युक्तो कुशी विश्वासमन्वितः ।।), २.१८.५५ ( ब्रह्मा के लिए कुशकेतु शब्द का प्रयोग - न शल्यभूता कुशकेतुपुत्री त्वत्संगमाद्विद्धि न संशयोऽत्र ।।), २.६२.४३ ( तीर्थ श्राद्ध में कुश की प्रतिमा बनाकर जल में निमज्जन से विशेष तीर्थ फल लाभ का कथन - प्रतिकृतिं कुशमयीं तीर्थवारिणि मज्जयेत् ।। यमुद्दिश्य विशालाक्षि सोऽष्टमांशं फलं लभेत् ।।.. ), पद्म १.४९.३२ (कुश की महिमा का कथन - कुशमूले भवेद्ब्रह्मा कुशमध्ये तु केशवः ।।कुशाग्रे शंकरं विद्धि कुश एते प्रतिष्ठिताः।), १.४९.३४ (कुश के ७ प्रकार - कुशाः काशास्तथा दूर्वा यवपत्राणि व्रीहयः । बल्वजाः पुंडरीकाश्च कुशास्सप्त प्रकीर्तिताः।), ५.६३.१९, ५.६४ ( जानकी - पुत्र कुश का शत्रुघ्न से युद्ध, हनुमान व सुग्रीव का बन्धन तथा सीता के समक्ष प्रदर्शन, माता के कहने पर कपीशों की मुक्ति, रामाश्वमेध हय का वृत्तान्त ), ब्रह्म १.११०.४१ ( केशव द्वारा स्वरोमों से उत्पन्न कुशों द्वारा पितरों के तर्पण आदि का वर्णन - ततः स्वरोमसंभूतान्कुशानादाय केशवः। स्वेदोद्भवांस्तिलांश्चैव चक्रे चोल्मुकमुत्तमम्।।), २.८४.१६ ( राम के अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर राम - पुत्रों लव व कुश द्वारा राम चरित्र के सस्वर गायन का उल्लेख ), २.९१.६३ ( ब्रह्मा द्वारा प्रणीता पात्र का सम्मार्जन करने पर कुशों के गिरने के स्थान पर कुशतर्पण तीर्थ के निर्माण का कथन - प्रणीतायां महाबुद्धे प्रणीतासंगमोऽभवत्। कुशतर्पणदेशे तु तत्तीर्थं कुशतर्पणम्।। ), ब्रह्माण्ड १.२.१४.२७ (कुशद्वीप में ज्योतिष्मान् के ७ पुत्रों के नाम से ७ वर्षों के नामकरण का उल्लेख ), १.२.१९.५२ (घृतोदक से परिवेष्टित कुशद्वीप के पर्वतों, नदियों तथा निवासियों का कथन ), २.३.६३.१९८, २०१ ( राम - पुत्र, अतिथि - पिता, कुश के कोशला राज्य तथा कुशस्थली नामक राजधानी का उल्लेख ), २.३.६६.३१ ( बलाकाश्व - पुत्र, कुशाम्ब, कुशनाभ, अमृतरयसोवसु तथा कुशिक नामक चार पुत्रों के पिता ), भविष्य १.१३८.४१( ब्रह्मर्षियों की कुश ध्वज का उल्लेख - ब्रह्मर्षीणां कुशः प्रोक्त इत्येषा ध्वज कल्पना ।यस्य यद्वाहनं प्रोक्तं तत्तस्य ध्वज उच्यते । । ), भागवत ३.२२.३० (वराह भगवान् के झडे हुए रोमों का ही कुश तथा काश रूप होना तथा इन्हीं कुशादि से मुनियों द्वारा यज्ञ - विध्वंसक दैत्यों का तिरस्कार कर यज्ञपुरुष के आराधना का कथन - न्यपतन्यत्र रोमाणि यज्ञस्याङ्गं विधुन्वतः ॥ कुशाः काशास्त एवासन् शश्वद्धरितवर्चसः ।), ५.१.३२ ( जम्बू आदि सप्त द्वीपों में से एक कुशद्वीप के घृत समुद्र से घिरे होने का उल्लेख ), ५.२०.१३ ( कुश द्वीपाधिपति प्रियव्रत - पुत्र हिरण्यरेता द्वारा द्वीप के सात विभाग करके अपने सात पुत्रों को प्रदान करना, सात पर्वतों तथा नदियों का कथन - घृतोदेन यथापूर्वः कुशद्वीपो यस्मिन्कुशस्तम्बो देवकृतः ), ९.११.११ ( सीता द्वारा कुश व लव की उत्पत्ति तथा वाल्मीकि द्वारा उनके संस्कार करने का उल्लेख ), ९.१२.१ ( अतिथि – पिता -- कुशस्य चातिथिस्तस्मात् निषधस्तत्सुतो नभः । ), ९.१५.४ ( बलाक - पौत्र, अजक - पुत्र, कुशाम्बु , तनाय, वसु तथा कुनाभ - पिता, पुरु वंश - ततः कुशः कुशस्यापि कुशाम्बुस्तनयो वसुः । ) , ९.१७.३, १६ ( सुहोत्र - पुत्र, प्रति - पिता, क्षत्रवृद्ध वंश ), ९.२४.१ ( ज्यामघ व शैब्या - पुत्र विदर्भ के तीन पुत्रों में से एक ), १०.७८.२८( बलराम द्वारा कुशाग्र से रोमहर्षण का वध - भावित्वात्तं कुशाग्रेण करस्थेनाहनत्प्रभुः।। ), मत्स्य १२.५१ ( राम - पुत्र, अतिथि - पिता, सूर्य वंश - अतिथिस्तु कुशाज्जज्ञे निषधस्तस्य चात्मजः। ), ५०.२७ ( चैद्योपरिचर व गिरिका के सात पुत्रों में से एक, पूरु वंश ), १२२.४५ ( कुश द्वीप वर्णनान्तर्गत दो नामों वाले सप्त पर्वतों, पर्वत वर्षों तथा नदियों का कथन - प्रथमः सूर्य्यसङ्काशः कुमुदो नाम पर्वतः। विद्रुमोच्चय इत्युक्तः स एव च महीधरः।।), महाभारत सभा ८०.८(धौम्यो रौद्राणि सामानि याम्यानि च विशाम्पते। गायन्गच्छति मार्गेषु कुशानादाय पाणिना।।), ८०.२२(पाण्डवों के वन गमन के समय धौम्य द्वारा कुशों को लेकर यात्रा करने का कारण - कृत्वा तु नैर्ऋतान्दर्भान्धीरो धौम्यः पुरोहितः। सामानि गायन्याम्यानि पुरतो याति भारत।।), अनुशासन २१४.४० (रथो वेदिर्ध्वजो यूपः कुशाश्च रथरश्मयः।।), लिङ्ग १.५३.७ ( कुशद्वीप के सात पर्वतों का नामोल्लेख - विद्रुमः प्रथमः प्रोक्तो द्वितीयो हेमपर्वतः।। तृतीयो द्युतिमान्नाम चतुर्थः पुष्पितः स्मृतः।।..), वराह ८७ ( कुशद्वीप के विस्तार, द्विनामा पर्वतों, वर्षों तथा नदियों का कथन ), १५७.१७ (मलयार्जुन तीर्थ के अन्तर्गत कुशस्थल नामक स्थान पर स्नान से ब्रह्मलोक की प्राप्ति का उल्लेख ), वामन ४७.१७(वेन का प्रसंग - ततः क्रोधसमाविष्टा ऋषयः सर्व एव ते। निजघ्नुर्मन्त्रपूतैस्ते कुशैर्वज्रसमन्वितैः ।), ९०.३० ( विदेह तीर्थ में विष्णु का कुशप्रिय नाम से वास - भूधरं देवकानद्यां विदेहायां कुशप्रियम्।। ), ९०.४२ ( कुश द्वीप में विष्णु का कुशेशय नाम से वास - जम्बुद्वीपे चतुर्बाहुं कुशद्वीपे कुशेशयम्। ), वायु ३३.१२ ( प्रियव्रत द्वारा ज्योतिष्मान् को कुशद्वीप का अधिपति बनाने का उल्लेख - शाल्मलौ तु वपुष्मन्तं राजानमभिषिक्तवान्।ज्योतिष्मन्तं कुशद्वीपे राजानं कृतवान् प्रभुः ।।), ४९.४६ (कुशद्वीप के पर्वतों, वर्षों, निवासियों व नदियों का कथन ), ६३.२४/२.२.२४( प्राचीनबर्हि नाम की निरुक्ति : प्राचीनाग्र कुश वाले - प्राचीनाग्राः कुशास्तस्य तस्मात्प्राचीन बर्ह्यसौ ।। ), ८८.१९७(कुशस्य कोशला राज्यं पुरी वापि कुशस्थली।.. उत्तराकोशले राज्यं लवस्य च महात्मनः।), ८८.१९९ ( राम - पुत्र, अतिथि - पिता, कुश के कोशला राज्य की कुशस्थली राजधानी होने का उल्लेख - कुशस्य पुत्रो धर्मात्मा ह्यतिथिः सुप्रियातिथिः। अतिथेरपि विख्यातो निषधो नाम पार्थिवः ।।), ९९.२२० ( विद्योपरिचर व गिरिका के सात पुत्रों में से एक - प्रत्यग्रहः कुशश्चैव यमाहुर्मणिवाहनम्।), विष्णु १.८.२१ ( लक्ष्मी के इध्मा तथा विष्णु के कुश होने का उल्लेख - चितिर्लक्ष्मीर्हरिर्यूप इध्मा श्रीर्भगवान्कुशः ॥ ), २.४.३५ ( कुशद्वीप के वर्णनान्तर्गत ज्योतिष्मान् के सात पुत्रों, निवासियों, वर्णाश्रमों, पर्वतों, नदियों आदि का कथन ), ४.७.८ (अजक - पौत्र, बलकाश्व - पुत्र, कुशाम्ब, कुशनाभ, धूर्तरजस व वसु - पिता ), शिव ५.२.१२ ( विद्युत्प्रभ द्वारा शिवकृपा से कुश द्वीप का राज्य प्राप्त करने का उल्लेख ), ५.१८.३९ ( कुश द्वीप के वर्णनान्तर्गत वहां के निवासियों , पर्वतों तथा नदियों का कथन ), स्कन्द ४.१.२१.४० ( ध्रुव द्वारा हरि स्तुति में श्रीहरि के तृणों में कुश होने का कथन - योगेषु व्यतिपातस्त्वं तृणेषु हि कुशो भवान् ।। ), ५.२.८३.३८ ( कपिल ऋषि द्वारा विष्णु से युद्ध में कुश - मुष्टि का आयुध के रूप में प्रयोग करने का उल्लेख - ततः स मुष्टिमादाय कुशानां कपिलस्तदा ।।वासुदेवं समासाद्य तिष्ठतिष्ठेत्यभाषत ।। ), ५.३.१४६.१११ ( मन्वादि तिथियों आदि में पितरों को कुशमिश्रित तिलोदक देने के फल का कथन ), ५.३.१८१.११ ( तपोरत भृगु द्वारा प्रतिमास कुशाग्र से जल बिन्दु पान का उल्लेख - दिव्यं वर्षसहस्रं तु मम ध्यानपरायणः ॥ जलबिन्दु कुशाग्रेण मासे मासे पिबेच्च सः । ), ५.३.१९८.८७ ( कुश द्वीप में उमा की कुशोदका नाम से स्थिति का उल्लेख - ओषधी चोत्तरकुरौ कुशद्वीपे कुशोदका ॥), ६.१०४.५ ( राक्षसों से त्रस्त ब्राह्मणों द्वारा राम - पुत्र कुश से भय का निवेदन, कुश का विभीषण के पास दूत प्रेषण, विभीषण द्वारा राक्षसों का ताडन तथा राक्षसों के आतङ्क से रक्षा का वर्णन ), ७.१.२४.४६ ( शिवार्चन में कुश पुष्प की आपेक्षिक महिमा का कथन - अपामार्गसहस्रेभ्यः कुशपुष्पं विशिष्यते ॥ कुशपुष्प सहस्रेभ्यः शमीपुष्पं विशिष्यते ॥ ), ७.४.२०.२१ ( चक्र तीर्थ का शासक दैत्य, दुर्वासा के स्नान में विघ्न पर कृष्ण द्वारा चक्र से वध, शिव कृपा से पुन: संजीवन, युद्ध, कृष्ण द्वारा गर्त में गिरे हुए कुश के ऊपर शिव लिङ्ग की स्थापना का वर्णन ), हरिवंश १.२७.११ ( बलकाश्व - पुत्र, कुशिक, कुशनाभ, कुशसाम्ब व मूर्तिमान् - पिता, पुरूरवा वंश ), ), ३.३७.३ ( उत्पन्न होते ही ब्राह्मणों द्वारा कुशों से धारण करने के कारण इन्द्र द्वारा कौशिक नाम प्राप्ति का उल्लेख - जातमात्रोऽथ भगवान्स कुशैर्ब्राह्मणैर्धृतः ।। तदाप्रभृति देवेशः कौशिकत्वमुपागतः ।।), वा.रामायण १.३२.१ (ब्रह्मा - पुत्र, कुशाम्ब आदि चार पुत्रों के पिता - ब्रह्मयोनिर्महानासीत्कुशो नाम महातपाः। वैदर्भ्यां जनयामास चतुरः सदृशान् सुतान्), ७.१०७.७ ( भरत द्वारा राम से कुश तथा लव के राज्याभिषेक तथा कुश को दक्षिण कोशल का राज्य प्रदान करने की प्रार्थना - इमौ कुशलवौ राजन्नभिषिञ्च नराधिप ।कोसलेषु कुशं वीरमुत्तरेषु तथा लवम् ।।), ७.१०८.४ ( राम द्वारा स्वपुत्रों कुश तथा लव हेतु क्रमश: कुशावती व श्रावस्ती नगरी के निर्माण का उल्लेख - कुशस्य नगरी रम्या विन्ध्यपर्वतरोधसि । कुशावतीति नाम्ना सा कृता रामेण धीमता । श्रावस्तीति पुरी रम्या श्राविता च लवस्य ह ।। ), लक्ष्मीनारायण १.२२७.७ (द्वारका के आग्नेय दिशा के रक्षकों में कुश का उल्लेख - अथाग्निदिशि तिष्ठन्ति ज्वालामुखोऽरुणाक्षकः ।। कुशः श्मशाननिलयो मांसाशी रुधिराशनः । ), १.२२७.५२ ( कृष्ण द्वारा कुश नामक दैत्य का शिर - छेदन कर कुश को गर्त में फेंकना, पाषाण से आच्छादित करके उसके ऊपर शिवलिङ्ग का निर्माण, कुश की इच्छा के अनुसार उस स्थान की कुशेश तीर्थ नाम से प्रसिद्धि का वर्णन - पुनश्च हरिणा स्वस्य गदया भिन्नमस्तकः । कुशो गर्ते तदा क्षिप्तो मृत्पाषाणैश्च भारितः ।।), १.३८२.२२( विष्णु के कुश व लक्ष्मी के इध्मा होने का उल्लेख - यूपोऽहं च चितिस्त्वं च त्वमिध्मा च कुशोऽस्म्यहम् ।।), १.५५९.२७( राजा रन्तिदेव द्वारा यज्ञ की दानवों से रक्षा हेतु चार दिशाओं में कुशों पर विष्णु चक्र स्थापित करके दुर्गों के निर्माण का कथन - विष्णोश्चक्रं कुशाग्रेऽत्र तिष्ठतु राक्षसार्दनम् । एवमुक्त्वा नार्मदे सुजले त्वाप्लाव्य तं कुशम् ॥ ), कथासरित् ४.२.१९६ ( गरुड द्वारा लाए हुए अमृत कलश को कुश - आसन पर रखवाकर नागों द्वारा गरुड की माता विनता को छोडने का उल्लेख - तथेत्युक्ते च तैर्नागैः स पवित्रे कुशास्तरे । सुधाकलशमाधत्त ते चास्य जननीं जहुः ।। ), ९.१.८९(वाल्मीकि द्वारा कुशों से कृत्रिम लव का निर्माण करने के कारण कुश की उत्पत्ति का वृत्तान्त - इति ध्यात्वा कुशैः कृत्वा पवित्रं निर्ममेऽर्भकम् ।। लवस्य सदृशं तं च स तथास्थापयन्मुनिः ।) । kusha