KRITTIKAA

Puraanic texts mention 6 Krittikas who were ex wives of seven famous rishis but were divorced after these krittikas fell in love with Agni/fire. The seventh wife was chaste and therefore she was not divorced. Later these krittikas brought up lord Skanda and drank their milk with his six mouths. The vedic version of this story may be that the gross matter has to be lifted up towards spiritual level by gradually introducing in it mind, vaak/senses, praana/life, chakshu/eyes, shrottra/ears, karma/action and at last agni/fire( It may be noted that the meaning of ear, eye etc. can not be taken in a trivial sense. This should be taken in a very higher sense, like third eye for eyes). This way gross matter may become krita, done. After that, there is a second and extreme stage which is called Kritti. And the lower aspect of Kritti will be called Krittikaa. These are 7 levels out of which 6 were discarded by 7 rishis. The names of existing 7 wives of 7 rishis are famous in puraanic texts and these are Sambhuuti, Smriti, Anasuuyaa, Preeti, Kshamaa, Sannati and Uurja. There may be slight variation in these name in different puraanic texts. It is said that seven rishis in our body are the seven most developed life forces like eyes, ears, mouth, nose etc. And there are two categories of 7 rishis – one, the earlier ones and the other – the latter ones. Everybody is having 7 rishis on his mouth, but these are earlier ones according to Dr. Fatah Singh. There may be a second set after the level of consciousness goes higher. What is the purpose of rishis? They want to collect life forces from the universe to sustain this body, the gross matter. An ordinary person collects life forces of the universe by his intake of food. But it is said about rishis that they can not take this gross food. They have to collect their life force from the universe itself. So they almost always remain hungry.

 

कृत्तिका

टिप्पणी : पुराणों में जिस प्रकार सप्तर्षि - पत्नियों के कृत्तिकाएं बन जाने का आख्यान आता है, उससे मिलता - जुलता एक आख्यान शतपथ ब्राह्मण २.१.२.१ में भी उपलब्ध होता है । इस आख्यान में कहा गया है कि पहले कृत्तिकाएं ( कृत्तिका नक्षत्र ) सप्तर्षियों की पत्नियां थीं । लेकिन बाद में वे सप्तर्षियों से अलग हो गईं क्योंकि सप्तर्षि उत्तर में उदित होते हैं जबकि कृत्तिकाएं कभी भी पूर्व दिशा के अतिरिक्त अन्य दिशा में उदित नहीं होती । आगे कहा गया है कि सप्तर्षियों व कृत्तिकाओं के इस बिछुडे मिथुन को कृत्तिकाओं का अग्नि से साथ मिथुन कराकर पूर्ण करते हैं । श्री सी.एम.वर्मा की पुस्तक हिस्ट्री आंफ संस्कृत लिटरेचर, जिसका संस्कृत साहित्य का इतिहास नाम से हिन्दी अनुवाद परिमल प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित है, में इस तथ्य का उपयोग शतपथ ब्राह्मण के काल का निर्धारण करने के लिए किया गया है जिसमें इस तथ्य को उजागर किया गया है कि ज्योतिषीय काल गणना के अनुसार कृत्तिकाएं ठीक पूर्व में कितने समय पूर्व उदित होती थीं , क्योंकि आजकल कृत्तिकाएं ठीक पूर्व में उदित नहीं होती । लेकिन पुराणों के वर्तमान संदर्भ में ध्यान देने योग्य तथ्य यह  है कि पुराणों से साम्य रखने वाला एक आख्यान ब्राह्मण ग्रन्थों में भी उपलब्ध है जिसमें कृत्तिकाओं  को सप्तर्षियों की पूर्व - पत्नियां कहा गया है । इस आख्यान को समझने में कृत्तिका और उससे पहले कृत्ति शब्द का अर्थ समझना उपयोगी होगा । पुराणों में शिव गजासुर का निग्रह करते हैं और उसे अपने त्रिशूल पर लटका लेते हैं । तब गजासुर प्रार्थना करता है कि उसने अपनी देह को इतना पवित्र कर लिया है, इतना सुगन्धमय बना लिया है कि वह शिव का स्पर्श कर सकी । तब शिव उसका चर्म उखाड कर उसको ओढ लेते हैं और उनका नाम कृत्तिवास हो जाता है । पुराणों की यह कथा संकेत करती है कि कृत्ति का अर्थ कृति की पराकाष्ठा, चर्म, चरम रूप हो सकता है । पहले पुरुषार्थ द्वारा कृति का निर्माण करना है, फिर कृत्ति बनेगी । कृति को शतपथ ब्राह्मण १०.५.३.३ के माध्यम से समझ सकते हैं । इस संदर्भ के अनुसार पहले भूत में मन का प्रवेश कराया जाता है । उसके फलस्वरूप भूत में जो परिवर्तन होता है, उसे भूतकृति कहते हैं । इसके पश्चात् भूतों? में व्यवस्था का सम्पादन करके उसे ऊर्जा को, अग्नि को ग्रहण करने योग्य बनाते हैं । मन के समावेश के पश्चात् भूतों में वाक् का समावेश कराया जाता है और उसके फलस्वरूप भूतों में वाणी की जो शक्ति उत्पन्न होती है, उसे भूतकृति कहते हैं । तब भूतों में व्यवस्था उत्पन्न करके उन्हें ऊर्जा के ग्रहण करने योग्य बनाया जाता है । इसी क्रम में भूतों में वाक् के पश्चात् प्राण, प्राण के पश्चात् चक्षु, चक्षु के पश्चात् श्रोत्र, श्रोत्र के पश्चात् कर्म, और कर्म के पश्चात् अन्त में अग्नि का प्रवेश कराया जाता है । अतः इस संदर्भ की ७ कृतियों में कर्म द्वारा उत्पन्न कृति छठी तथा अग्नि द्वारा उत्पन्न कृति सातवी है । छान्दोग्य उपनिषद ७.२१.१ के अनुसार कर्म सुख प्राप्ति के लिए, भूमा बनने के लिए किया जाता है । इस संदर्भ से हमें यह सोचने को बाध्य होना पडेगा कि शतपथ ब्राह्मण में अग्नि से उत्पन्न जिस सातवी कृति का उल्लेख है, क्या वह भूमानन्द ही है ? पुराणों के अनुसार तो ६ कृत्तिकाएं तो सप्तर्षियों द्वारा त्याग दी जाती हैं, लेकिन सातवी कृत्तिका ( अरुन्धती ? ) पतिव्रता है और सप्तर्षियों द्वारा उसका त्याग नहीं होता । अरुन्धती की निरुक्ति अरुणं धत्ते इति, अन्धकार के पश्चात् प्रकाश की पहली किरण को धारण करने वाली के रूप में की जा सकती है । यही भूमानन्द को उत्पन्न करने वाली हो सकती है । अतः ६ कृत्तिकाएं अन्धकारमय होनी चाहिएं ।

          शतपथ ब्राह्मण और पुराणों में कृत्तिकाओं को सप्तर्षियों की पूर्व पत्नियां कहने से क्या तात्पर्य हो सकता है ? पुराणों में सप्तर्षियों की स्थिति ग्रहों से ऊपर तथा ध्रुव से नीचे कही गई है । ग्रहों के बारे में कहा जा सकता है कि उनमें अपनी स्वयं की ज्योति का अभाव है । वह दूसरों से ज्योति ग्रहण करते हैं । लेकिन सप्तर्षियों के बारे में यह कहा जा सकता है कि उनमें स्वयं की ज्योति भी है और वह दूसरों से ऊर्जा ग्रहण करने में भी समर्थ हैं । भूतकृति इसी अवस्था को प्राप्त करके बनाई जा सकती है । प्रश्न यह उठता है कि क्या ऊपर उल्लेख किए गए मन, वाक् , प्राण आदि को सप्तर्षि कहा जा सकता है ? शतपथ ब्राह्मण ८.४.३.६ और ९.३.१.२१ में शीर्षण्य प्राणों को सप्तर्षि कहा गया है । शीर्ष प्राणों का अर्थ होगा जो ऊर्जा का सर्वाधिक भरण कर सके । अलग - अलग स्तरों पर शीर्ष प्राण अलग - अलग होते हैं और शतपथ ब्राह्मण ९.३.१.२१ से प्रतीत होता है कि मरुतों के ७ गण भी शीर्ष प्राण हो सकते हैं । अतः यह अनिर्णीत ही रह जाता है कि सप्तर्षि किन्हें कहें । पुराणों के सार्वत्रिक वर्णन के अनुसार तो सप्तर्षियों में मरीचि की पत्नी सम्भूति है, अङ्गिरा की स्मृति, अत्रि की अनसूया, पुलस्त्य की प्रीति, पुलह की क्षमा, क्रतु की सन्नति और वसिष्ठ की ऊर्जा ( अग्नि पुराण २०) । यदि पुराणों में वर्णित इन ऋषियों की पत्नियां कृत्तिकां बनी तो इन नामों की सम्यक् व्याख्या अपेक्षित है । तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.४.१ में कृत्तिकाओं के नाम अम्बा, दुला, चुपुणिका, नितत्नी, मेघयन्ती और वर्षयन्ती दिए गए हैं और इन नामों का पुराणों के साथ तादात्म्य स्थापित करना कठिन प्रतीत होता है ।

          पुराणों में कृत्तिकाओं द्वारा षण्मुख/ स्कन्द को जन्म देने की कथा विलक्षण है । अथर्ववेद ९.१२.३/९.७.३ में कृत्तिका को गौ के स्कन्ध कहा गया है । भागवत पुराण में विभिन्न खण्डों को स्कन्ध नाम दिया गया है और ऐसा प्रतीत होता है कि स्कन्ध एक के अन्दर से एक उत्पन्न होते हैं, स्थूल से सूक्ष्म और अतिसूक्ष्म । जैसा कि अन्यत्र भी उल्लेख किया जाता रहा है, भागवत पुराण के १२ स्कन्ध द्वादशाह यज्ञ के प्रतीक प्रतीत होते हैं जिनमें ६ दिनों में तो वृत्र वध सम्पन्न होता है और उसके पश्चात् ३ दिन छन्दोमों, आनन्द के दिन होते हैं । जैसा कि डा. फतहसिंह ने इंगित किया है, ऐसा भी होता है कि सातवें दिन में अन्तिम सभी ६ दिनों का समावेश कर दिया जाए । अतः प्रथम ६ दिन कठोर साधना के तथा सातवां दिन आनन्द की अवस्था कहे जा सकते हैं । स्कन्द/स्कन्ध का जन्म तारकासुर के वध के लिए हुआ है । तारक को उपनिषदों में एक ज्योति कहा गया है जिसका उद्धार स्कन्द कर सकता है । लेकिन इस प्रकल्पना में यह आपत्ति हो सकती है कि यदि द्वादशाह के ६ दिनों को स्कन्द के ६ मुख मानें तो मन, वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र और कर्म की भी ६ दिनों के यज्ञों से साथ क्रमिक संगति बैठनी चाहिए जो आवश्यक नहीं है कि हो ही । भविष्य पुराण में कलिङ्गभद्रा द्वारा चीर्णित कृत्तिका व्रत में कृत्तिकाओं के हिरण्मय, रजतमय, रत्नमय, नवनीतमय, कणिकामय और पिष्टमय बिम्ब बनाने का निर्देश है । इन बिम्बों का साम्य पुराणों में विभिन्न प्रकार की धेनुओं के दान के संदर्भ में उल्लिखित धेनुओं से बैठता है ।

          कार्तिक मास में अमावास्या को दीप प्रज्वलन के संदर्भ में तैत्तिरीय ब्राह्मण १.५.१.१ में कृत्तिका नक्षत्र का यह लक्षण महत्त्वपूर्ण है कि शुक्रं परस्तात्, ज्योतिरवस्तात् । इसका अर्थ हुआ कि कृत्तिकाओं का कार्य निचले स्तर पर ज्योति उत्पन्न करना है, अंधकार में ज्योति उत्पन्न करना है । कृत्तिका शब्द की निरुक्ति कृत् - छेदने धातु से  की जाती है और कृत्तिकाओं को कैंची भी कहा जाता है । इस अर्थ में यह कितनी सार्थक हैं, यह अन्वेषणीय है ।

          पुराणों में कृत्तिकाओं द्वारा अग्नि पर तापने से अग्नि से शिव का वीर्य ग्रहण करने और गर्भवती होने का कथन आता है । दूसरी ओर, तैत्तिरीय ब्राह्मण २.१.४.८ तथा गोपथ ब्राह्मण १.३.१२ में अग्निहोत्र के संदर्भ में उल्लेख आता है कि अग्निहोत्र के अन्त में स्रुचि या स्रुव का आहवनीय अग्नि पर तापन करके उस पर हाथ रखे या हाथ का तापन करके उसे स्रुव पर रखे । यह कार्य सप्तर्षियों की प्रसन्नता के लिए किया जाता है । पुराणों तथा ब्राह्मणों के कथन से इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि इस  कृत्य का कोई गम्भीर अर्थ है जिसे समझना बाकी है । जो कार्य यज्ञ में बाह्य प्रतीक रूप में किया जाता है, उसे आन्तरिक क्रिया के रूप में समझना है । अन्दर की आहवनीय अग्नि द्वारा हाथ रूपी क्रियात्मक शक्ति प्रभावित हो, यह तात्पर्य हो सकता है ।

          पुराणों में कृत्तिकाओं द्वारा अग्नि के सेवन से गर्भ धारण करने के तथ्य के संदर्भ में ब्राह्मण ग्रन्थों में अग्नि को कृत्तिका नक्षत्रों का देवता कहा गया है जिसमें अग्नि का आधान किया जा सकता है ( तैत्तिरीय ब्राह्मण १.१.२.१ तथा ३.१.१.१ ) । शतपथ ब्राह्मण २.१.२.१ में तो अग्नि का कृत्तिकाओं के पति के रूप में ही चित्रण किया गया है ।

प्रथम लेखनः- ४.१.२००२ई.

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