Puraanic contexts of words like Kshara/decaying, Ksheera, Ksheeraabdhi, Kshudhaa/hunger, Kshupa, Kshetra etc. are given here.

क्षय वायु ९९.२८१/२.३७.२७७( बृहत्क्षय : बृहद्रथ - पुत्र, क्षय - पिता, इक्ष्वाकु वंश ), लक्ष्मीनारायण २.२६५ ( अश्वपट्ट तीर्थ में स्नान से क्षय रोग निवारण का वर्णन ) ।

 

क्षर ब्रह्म १.१३३.१० ( करालजनक के पूछने पर वसिष्ठ द्वारा संसार के क्षरत्व तथा परब्रह्म के अक्षरत्व का निरूपण ), महाभारत शान्ति २८०.२० ( श्रीहरि के ही सम्पूर्ण प्राणियों में क्षर - अक्षर रूप से विद्यमान होने का उल्लेख ), ३०२)३५ ( पाञ्चभौतक व्यक्त जगत् का ही प्रतिदिन क्षरण होने से क्षर नाम धारण का कथन ), ३०५.३६ ( सदा एक रूप में रहने वाले परमात्मतत्त्व का अक्षर तथा नाना रूपों में प्रतीत होने वाले प्राकृत प्रपञ्च का क्षर रूप में उल्लेख ), ३०७.११ ( सांख्यमतानुसार प्रकृति और पुरुष दोनों के ही अक्षर और क्षर होने का कथन ), लक्ष्मीनारायण २.२५६.२ ( संसार का क्षरत्व, आत्मा का अक्षरत्व, क्षरमोचन तथा अक्षरगमन का निरूपण ) । kshara

 

क्षाता स्कन्द ५.१.५६.१ ( क्षाता सङ्गम तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन ), ५.१.५६.६ ( रेवा, चर्मण्वती व क्षाता नामक तीन पावन नदियों की अमरकण्टक से उत्पत्ति होने का उल्लेख ) ।

 

क्षान्ति पद्म ५.८४.५७ ( श्रीहरि के अहिंसा, क्षान्ति प्रभृति आठ पुष्पों के अर्चन से तुष्ट होने का उल्लेख ), विष्णु २.४.५५ ( क्रौञ्च द्वीप की सप्त नदियों में से एक ), विष्णुधर्मोत्तर १.४२.१९( विष्णु की जानुओं में क्षान्ति की स्थिति ), कथासरित् १२.३२ ( वेताल पञ्चविंशति के अन्तर्गत २५ वीं कथा के रूप में क्षान्तिशील नामक भिक्षुक की कथा ) । kshaanti

 

क्षाम ब्रह्माण्ड १.२.१२.३७ ( सहरक्ष - पुत्र तथा क्रव्यादग्नि - पिता क्षाम का गृहदाही अग्नि रूप में उल्लेख ), १.२.३६.२७ ( स्वारोचिष मनु युग के १२ सुधामा देवों में से एक ), वायु २९.३४ ( सहरक्ष - पुत्र क्षाम का गृह - दाही अग्नि रूप में उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण ३.३२.१९ ( सहरक्षा अग्नि - पुत्र, क्रव्याद - पिता ) । kshaama

 

क्षार लक्ष्मीनारायण १.३२२.७३( क्षार त्याग पर उद्यापन में रस दान का निर्देश ) ।

 

क्षारकर्दम भागवत ५.२६.७, ३० ( अग्रजों तथा पूज्यों का अनादर करने से प्राप्त नरक का नाम, २८ नरकों में से एक ), वराह २००.२८ ( वैतरणी नामक नरक की क्षारोदा नदी का कथन ), लक्ष्मीनारायण १.३७०.४९ ( नरक में क्षार कुण्ड प्रापक कर्मों का उल्लेख ) ।

 

क्षालिताघौघा स्कन्द ४.१.२९.६८ ( गङ्गा सहस्रनामों में से एक ) ।

 

क्षिप्र गणेश २.३३.२८ ( क्षिप्रप्रसादन : प्रियव्रत व कीर्ति - पुत्र, विमाता द्वारा विषदान, गृत्समद द्वारा जीवनदान ), २.८५.२६ ( क्षिप्रप्रसादन गणेश से बाहुद्वय की रक्षा की प्रार्थना ), ब्रह्माण्ड २.३.७१.२५८ ( उपासङ्ग - पुत्र, वृष्णि वंश ), वायु ९६.२४९ ( उपाङ्ग - पुत्र, विष्णु वंश ) ।

 

क्षिप्रा ब्रह्माण्ड १.२.१६.२९ ( पारियात्र पर्वत से नि:सृत एक नदी ), १.२.१६.३३ ( विन्ध्याचल से नि:सृत एक नदी ), मत्स्य २२.२४ ( पितृप्रिय तीर्थों में क्षिप्रा नदी का उल्लेख ), ११४.२७ ( विन्ध्याचल से नि:सृत एक नदी ) । kshipraa

 

क्षीर गरुड २.२.८०(क्षीरहारी के बलाक बनने का उल्लेख), ३.१४.३५(आश्विन् में क्षीर के निःसार होने का उल्लेख), ब्रह्माण्ड १.२.१५.७४( कुरु वर्ष में क्षीरी वृक्षों की स्थिति का कथन ), मत्स्य १९६.६ ( गोत्रप्रवर्तक आंगिरस ऋषियों में से एक ),शिव १.१६.५० ( हरीतकि , मरिच, वस्त्र व क्षीर दान से क्षय रोग के क्षय का उल्लेख ), स्कन्द २.८.७ ( राजा दशरथ द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करने पर यज्ञ में क्षीर की प्राप्ति होने से उस स्थान की क्षीरोदक तीर्थ के रूप में प्रसिद्धि का वर्णन ), २.८.८.६८ ( कामधेनु के स्तनों से प्रवाहित दुग्ध से क्षीरकुण्ड के निर्माण का उल्लेख ), ३.१.३७.३ ( विष्णु द्वारा मुद्गल हेतु क्षीरकुण्ड के निर्माण तथा कुण्ड के माहात्म्य का कथन ), लक्ष्मीनारायण २.१५.२५ ( क्षीर से महेश्वर की तुष्टि का उल्लेख ) । ksheera

 

क्षीराब्धि गर्ग १.५.२६ ( क्षीराब्धि के शन्तनु रूप में अवतरण का उल्लेख ), ब्रह्माण्ड १.२.१९.१०२ ( समान विस्तार वाले क्षीरोद समुद्र से शाकद्वीप के आवृत्त होने का उल्लेख ), १.२.२५.४५ ( क्षीरोद मन्थन से सर्वप्रथम विष के समुत्थित होने का उल्लेख ), ३.४.९.५६ ( देवों और दैत्यों द्वारा नाना प्रकार की औषधियों का क्षीरसागर में प्रक्षेपण, समुद्र मन्थन का वृत्तान्त ), ३.४.९.६४ - ६६ ( देवों और दैत्यों द्वारा क्षीराब्धि मन्थन से सुरभि तथा वारुणी देवी के प्राकट्य का कथन ), भागवत ५.१.३३, ५.२०.१८( सप्त समुद्रों में से एक क्षीरोद की क्रौञ्च द्वीप के चतुर्दिक् स्थिति का उल्लेख ), मत्स्य १२२.४९( कुशद्वीप के वर्णन में कुशद्वीप द्वारा क्षीरोद को चारों ओर से आवृत करने का उल्लेख; कुश द्वीप के ७ पर्वतों वर्षों आदि का वर्णन ), वायु ५४.४९( अमृतमन्थन के समय क्षीरोद से विष निकलने का उल्लेख ), १०६.४८ ( गयासुर के मस्तक पर यमशिला की स्थापना और देवों के पाद प्रक्षेप से भी गयासुर के अस्थिर रहने पर ब्रह्मा का व्याकुल होकर क्षीरसागर में शयन करने वाले विष्णु के पास सहायतार्थ गमन का कथन ), विष्णु १.८.१६ ( अमृत मन्थन में क्षीराब्धि से लक्ष्मी की उत्पत्ति का उल्लेख ), १.९.७७ ( अमृत हेतु देवों और दैत्यों द्वारा क्षीराब्धि में औषधि प्रक्षेपण का उल्लेख ), २.४.७१ ( शाक द्वीप के क्षीरोद से आवृत होने का उल्लेख ), शिव ५.१८.५९ ( शाक द्वीप के परित: क्षीरोद समुद्र होने का उल्लेख ), स्कन्द ४.२.५८.३१ ( क्षीराब्धि तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य ), ४.२.८४.७ ( वही), लक्ष्मीनारायण १.३८५.१०३(क्षीरोद में कृष्ण के चतुर्भुज होने का उल्लेख),  ksheeraabdhi

 

क्षीरी पद्म १.२८.२५ ( क्षीरी का आयुप्रदाता वृक्ष के रूप में उल्लेख ) ।

 

क्षीरोदवीर लक्ष्मीनारायण ४.४७.१३( रुहारणि - पति, लक्ष्मीनारायण संहिता श्रवण से क्षीरोदवीर राजा की मुक्ति का कथन ) ।

 

क्षुत कथासरित् ६.२.१२९ ( शयनागार में सौ बार क्षुत / छींक आने पर राजपुत्र की मृत्यु हो जाने का पूर्वकथन )

 

क्षुद्र नारद १.९०.७५( क्षौद्र द्वारा सौभाग्य सिद्धि का उल्लेख ), भागवत १०.८५.५१ ( क्षुद्रभृत् : कंस द्वारा वध को प्राप्त हुए देवकी के ६ पुत्रों में से एक, श्रीकृष्ण की कृपा से सभी ६ पुत्रों को सद्गति प्राप्त होने का उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण १.४२४.१८( क्षुद्र के नाश हेतु चण्डिका का उल्लेख ) । kshudra

 

क्षुद्रविद्राविणी स्कन्द ४.१.२९.६८( गङ्गा सहस्रनामों में से एक )।

 

क्षुधा गरुड १.२१.५( तत्पुरुष की ८ कलाओं में से एक ), देवीभागवत ९.१.११९( लोभ की २ भार्याओं में से एक ), नारद १.९१.७४ ( अघोर शिव की सप्तम कला ), पद्म १.१९.२७३ ( ऋषियों द्वारा क्षुधा वेदना का वर्णन ), २.९९.७७( क्षुधा तृप्ति हेतु ८ दानों के नाम ), ब्रह्म २.१५.१४( क्षुधा पीडित कण्व द्वारा गौतमी गङ्गा तथा क्षुधा देवी का स्तवन, गङ्गा तथा देवी द्वारा अभिलषित वर प्रदान करना, उस स्थान की काण्व, गाङ्ग तथा क्षुधा तीर्थ नाम से प्रसिद्धि ), मत्स्य २५२.९( क्षुधाविष्ट भूत/वास्तु द्वारा अन्धकासुरों के रक्त का पान करने पर भी क्षुधा का शान्त न होना, जगतीत्रय को स्वदेह से आविष्ट करना ), योगवासिष्ठ ३.६९.२ ( कर्कटी राक्षसी का स्वक्षुधा शान्ति हेतु अनायसी व आयसी जीवसूचिका होने का वृत्तान्त ), ३.७४.१५( सूची द्वारा उदर सौषिर्य के पिण्डीकरण द्वारा अशना निवारण का उल्लेख ), शिव ५.११.२२ ( क्षुधा के व्याधियों में श्रेष्ठतम तथा दुःखरूप होने का उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण २.२५३.४ ( जीवरथ में क्षुधा व तृषा नामक दो वाहकों का उल्लेख ), कथासरित् ७.८.३९ ( रूपिणी विद्या द्वारा क्षुधा व तृष्णा शान्त होने का उल्लेख ) kshudhaa

क्षुधा ब्राह्मण ग्रन्थों में कहा गया है कि इन्द्र ने वृत्र को मारा तो वह २ भागों में विभाजित हो गया । एक भाग चन्द्रमा या सोम बन गया और दूसरा अशना । हम जो खाते हैं, यह उसी अशना रूपी वृत्र की तृप्ति के लिए खाते हैं। सोम जितना पूर्ण होता जाएगा, अशना उतनी ही क्षीण होती जाएगी ।

क्षुप मार्कण्डेय ११९( खनित्र - पुत्र, प्रमथा व नन्दिनी - पति, विवंश - पिता, क्षुप के चरित्र का कथन ), लिङ्ग १.३५ ( नृप व द्विज के श्रेष्ठता विवाद में क्षुप नृपति की पराभव का वर्णन ), १.३६ ( क्षुप व दधीचि के संवाद का वर्णन ), वायु ८६.६ ( खनित्र - पुत्र, विंश - पिता, वैवस्वत मनु वंश ), वा.रामायण ७.७६.४२ ( क्षुप नामक राजा की उत्पत्ति तथा लोकपालों द्वारा प्रदत्त तेज से क्षुप नृप को संयुक्त करने का कथन ), लक्ष्मीनारायण ४.५९.५९ ( राजा क्षुप और दधीचि के मध्य नृप - विप्र श्रेष्ठता विषयक विवाद का वृत्तान्त ) ; द्र. क्षुव kshupa

 

क्षुरिका नारद १.५६.३८० ( क्षुरिका बन्धन कर्म काल का विचार ), ब्रह्मवैवर्त्त २.३०.१२६ ( ग्राम आदि का दहन करने पर क्षुरधार नरक की प्राप्ति का कथन ), लक्ष्मीनारायण १.३७०.१२२ ( नरक में क्षुरधार कुण्ड प्रापक कर्मों का उल्लेख ) ।

 

क्षुव देवीभागवत ७.८.५१( मनु - पुत्र, इक्ष्वाकु - पिता ), शिव २.२.३८.८, २.२.३९ ( राजा क्षुव व दधीचि मुनि के मध्य ब्राह्मण व नृप में श्रेष्ठवर होने के सम्बन्ध में विवाद, दधीचि द्वारा ब्राह्मण के श्रेष्ठत्व को प्रमाणित करने का वृत्तान्त ) ; द्र. क्षुप kshuva

 

क्षुवन लक्ष्मीनारायण २.५.३२ ( क्षुवन आदि दैत्यों द्वारा बाल कृष्ण को मारने का उद्योग, षष्ठी देवी द्वारा बाल कृष्ण की रक्षा का उल्लेख ) ।

 

क्षेत्र गणेश २.१४६.२२ ( पञ्चभूत, तन्मात्रा आदि आदि के समूह की क्षेत्र संज्ञा का कथन ; सूक्ष्म क्षेत्रज्ञ को जानने का निर्देश ), पद्म ६.२२२.८६( निवास क्षेत्र की परिक्रमा का निर्देश ), ब्रह्माण्ड १.१.३.३७( अव्यक्त के क्षेत्र तथा ब्रह्म के क्षेत्रज्ञ होने का उल्लेख ), वायु १०२.३४ ( अव्यक्त के क्षेत्र और ब्रह्मा के क्षेत्रज्ञ होने का उल्लेख ), १०२.३६ ( क्षेत्र के अविषय और ब्रह्मा के विषय होने का उल्लेख ), शिव १.१२( शिव क्षेत्रों का वर्णन ), महाभारत शान्ति ३०७.१६( क्षेत्रज्ञ को क्षेत्र में लीन करने पर प्रकृति के क्षर बनने का कथन ), ३१९.४०( क्षेत्र व क्षेत्रज्ञ की परिभाषा ), अनुशासन ६.८ ( देव बीज व पुरुषार्थ क्षेत्र होने का कथन ), योगवासिष्ठ ६.२.९४.६८( अन्तरिक्ष रूप अक्षय क्षेत्र में खं गगन रूपी बीज से उत्पन्न प्रजाओं का वर्णन ), लक्ष्मीनारायण १.५१४.३(३ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के नाम), ३.१८.११ ( क्षेत्र दान के पुत्र दान से श्रेष्ठ व आरोग्य दान से अवर होने का उल्लेख ) ; द्र. कुरुक्षेत्र । kshetra

 

क्षेत्रज्ञ नारद १.४७.३८ ( केशिध्वज द्वारा खाण्डिक्य को वर्णित योग स्वरूपान्तर्गत अपरा नाम धारी क्षेत्रज्ञ शक्ति के प्राणियों में क्रमश: विकास का कथन ), ब्रह्माण्ड १.१.३.३७( अव्यक्त के क्षेत्र तथा ब्रह्म के क्षेत्रज्ञ होने का उल्लेख ), १.२.३२.८५, ३.४.३.८७ ( क्षेत्र ज्ञान से युक्त होने के कारण परम पुरुष के क्षेत्रज्ञ अभिधान का कथन ), ३.४.४.१९ ( सृष्टि प्रारम्भ के समय क्षेत्रज्ञ द्वारा अधिष्ठित गुणों के विषमता को प्राप्त होने, क्षेत्र व क्षेत्रज्ञ के व्यक्तावस्था को प्राप्त होने तथा क्षेत्रज्ञ द्वारा अधिष्ठित सत्त्व के विकार को उत्पन्न करने का कथन ), भागवत ५.११.११( मन की क्षेत्रज्ञ से भिन्नता का कथन ), १२.१.५ ( क्षेत्रधर्मा - पुत्र, विधिसार - पिता, शिशुनाग वंश ), वराह ३५.११( देह में क्षेत्रज्ञ पुरुष का ही सोम नाम होने का उल्लेख ), वायु १०१.२२३ ( नित्य अपरिसंख्येय, परस्पर गुणाश्रयी, सूक्ष्म , प्रसवधर्मिणी प्रकृतियों से ब्रह्म नामक जगत्कर्त्ता क्षेत्रज्ञ के प्रादुर्भाव का उल्लेख ), १०२.३४ ( अव्यक्त के क्षेत्र और ब्रह्म के क्षेत्रज्ञत्व का कथन, क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ की क्रमश: विषयत्व एवं अविषयत्व प्रसिद्धि का कथन ), १०३.१७ ( साम्यावस्था में प्रतिष्ठित गुणगणों के सृष्टि प्रारम्भ के समय क्षेत्रज्ञ द्वारा अधिष्ठित होकर विषमता को प्राप्त होने, क्षेत्र व क्षेत्रज्ञ के व्यक्तावस्था को प्राप्त होने, क्षेत्रज्ञ द्वारा अधिष्ठित सत्त्व के विकार को उत्पन्न करने का कथन ), विष्णु ६.७.६१( विष्णु की क्षेत्रज्ञ संज्ञक अपरा शक्ति का वर्णन ), महाभारत २३६.३२ ( व्यक्त के सत्त्व /क्षेत्र तथा अव्यक्त के क्षेत्रज्ञ होने का कथन ), शान्ति १८७.२३ ( प्राकृत गुणों से युक्त आत्मा के क्षेत्रज्ञ व गुणों से मुक्त आत्मा के परमात्मा होने का कथन ), ३४४.१८ ( भगवान वासुदेव के ही निर्गुण क्षेत्रज्ञ होने का कथन ), आश्वमेधिक ३४.१०( क्षेत्र व क्षेत्रज्ञ के विषय में ब्राह्मण - ब्राह्मणी संवाद ), योगवासिष्ठ ४.४२.२१ ( चित् का रूप क्षेत्रज्ञ होने का उल्लेख , क्षेत्रज्ञ द्वारा शरीर रूपी क्षेत्र को बाह्याभ्यन्तर अखण्डित रूप में जानने का उल्लेख ), ४.४२.२३ ( क्षेत्रज्ञ के वासनाग्रस्त होने पर अहंकार बनने का कथन ) । kshetrajna

 

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