Puraanic contexts of words like Khanjana, Khatvaanga, Khanda/piece, Khadira, Khadyota, Khanitra, Khara/ass are given here.

खङ्गदंष्ट्रा कथासरित् ७.८.१४१ ( यमदंष्ट्र राक्षस की बहन, राजा इन्दीवरसेन पर अनुरक्त ,पश्चात् विवाह ) ।

 

खङ्गधर कथासरित् ९.२.१०३ ( अनङ्गरति से विवाह के इच्छुक चार वीरों में से एक खङ्गधर नामक क्षत्रिय का राजा महावराह के समक्ष स्व परिचय देना, राजा द्वारा चारों वीरों की परीक्षा तथा अनङ्गरति से किसी एक वीर को वरण करने के निवेदन का वृत्तान्त ), १२.१६.२७ ( वही) ।

 

खङ्गबाहु पद्म ६.१९० ( खङ्गबाहु राजा का ब्राह्मण से गीता के १६ वें अध्याय का माहात्म्य जानकर उन्मत्त हाथी को वश में करना ) ।

 

खङ्गरोमा पद्म ६.१३.२ ( जालन्धर - सारथी ) ।

 

खङ्गवर्मा लक्ष्मीनारायण ३.२१६.१९ ( सञ्जय देव नामक भगवद् भक्त शिल्पी द्वारा राजा खङ्गवर्मा के नूतन प्रासाद का निर्माण ) ।

 

खङ्गिनी स्कन्द ४.१.२९.४६ ( गङ्गा सहस्रनामों में से एक ) ।

 

 खङ्गी ब्रह्माण्ड ३.४.४४.७० (वर्णों के ५१ गणेशों में से एक ), शिव ५.३४.२६ ( चतुर्थ तामस मन्वन्तर में तामस मनु के १० पुत्रों में से एक ) ।

 

खञ्जन स्कन्द १.२.६२.२८( क्षेत्रपालों के ६४ प्रकारों में से एक ), ७.४.१६.३४ ( खञ्जनक दैत्य के नाम पर खञ्जनक तीर्थ का निर्माण, तीर्थ में स्नान से सोमलोक की प्राप्ति ), ७.४.१७.२३ ( द्वारका के उत्तर द्वार पर स्थित क्षेत्रपाल ), लक्ष्मीनारायण २.५.३४ ( खञ्जन प्रभृति दैत्यों द्वारा बाल प्रभु को मारने का उद्योग, षष्ठी देवी द्वारा प्रभु की रक्षा का वृत्तान्त ) । khanjana

 

खञ्जरीट वराह १३८.११ ( सौकरव तीर्थ के प्रभाव से खञ्जरीट पक्षी का वैश्य बालक के रूप में जन्म ), लक्ष्मीनारायण १.५७८.५ ( ईश क्षेत्र में गायन से खञ्जरीट पक्षी के मरणोपरान्त वैभव सम्पन्न वैश्य के गृह में जन्म तथा मुक्ति का वर्णन ) ।

 

खट्वा कथासरित् १८.५.२१२ ( मूलदेव के पुत्र द्वारा पिता की खाट / शय्या के विक्रय का वृत्तान्त ) ।

 

खट्वाङ्ग ब्रह्म १.६.७४ ( अंशुमान् - पुत्र तथा भगीरथ - पिता दिलीप की खट्वाङ्ग नाम से प्रसिद्धि, मुहूर्त मात्र जीवन में तत्त्व प्राप्ति ), ब्रह्माण्ड २.३.१०.९० ( उपहूत नामक पितरगणों की मानसी कन्या यशोदा का पुत्र ), २.३.६३.१८२ ( विश्वसह - पुत्र दिलीप की खट्वाङ्ग नाम से प्रसिद्धि तथा मुहूर्त्त मात्र जीवन में सत्य प्राप्ति का कथन ; दीर्घबाहु - पिता ), भागवत २.१.१३ ( राजा खट्वाङ्ग द्वारा मुहूर्त मात्र में ही अभयपद को प्राप्त करने का उल्लेख ), ९.९.४१ ( सूर्यवंशीय विश्वसह - पुत्र राजा खट्वाङ्ग का मृत्यु समय में भगवान में मन तथा ब्रह्म प्राप्ति ), ९.१०.१ ( दीर्घबाहु - पिता, रघु - पितामह, सूर्य वंश ), ११.२३.३० ( राजा खट्वाङ्ग द्वारा मुहूर्त भर में ही ब्रह्मलोक प्राप्त कर लेने का उल्लेख ), वायु ७३.४१ ( उपहूत नामक पितरगणों की मानसी कन्या यशोदा का पुत्र, एक राजर्षि ), ८८.१८२ ( खट्वाङ्गद : विश्वमहत् - पुत्र दिलीप की खट्वाङ्गद नाम से प्रसिद्धि तथा मुहूर्त मात्र जीवन में सत्य प्राप्ति का कथन ; दीर्घबाहु - पिता ), विष्णु ४.४.७६ ( विश्वसह - पुत्र, दीर्घबाहु -पिता, मुहूर्त मात्र जीवन में वासुदेव में चित्त लीनता का कथन ), स्कन्द ४.२.९७.७१ ( खट्वाङ्गेश लिङ्ग के दर्शन से मनुष्य के निष्पाप होने का उल्लेख ), ५.१.१९.३( शिव द्वारा नागेश शशिखट्वाङ्ग को दक्षिण कर में धारण करने का उल्लेख ), हरिवंश १.१५.१३ ( अंशुमान - पुत्र दिलीप की खट्वाङ्ग नाम से प्रसिद्धि तथा मुहूर्त भर में तत्त्व प्राप्ति का उल्लेख ), २.२५.४८ ( खट्वाङ्ग वन में हुए कंस - नारद संवाद में नारद द्वारा कंस को वसुदेव - पुत्र की उत्पत्ति आदि का कथन ), २.३९.५८( कृष्ण व बलराम द्वारा खट्वाङ्ग नदी की शोभा निहारने का कथन ), लक्ष्मीनारायण १.५५.३१, १.५६, १.५७ ( रैवत मनु की दक्षिण भुजा के अङ्गद से खट्वा पर होने से खट्वाङ्गद नाम धारण, तप से लक्ष्मी नारायण के दर्शन, बर्हिषाङ्गद - पिता ), २.३७.१४ ( सौराष्ट्र देशीय राजा के सैनिकों का वराटक दैत्य के सैनिकों से युद्ध, वराटक दैत्य की पराजय का वर्णन ), कथासरित् १८.५.८ ( कापालिक द्वारा सिद्धियुक्त खट्वाङ्ग / सोंटे की सहायता से कन्याओं का हरण, ब्राह्मण कुमार द्वारा खट्वाङ्ग को गङ्गा में फेंक देने पर कापालिक के सिद्धिरहित होने का कथन ) । khatvaanga

 

खड्ग गणेश २.६८.३२ ( देवान्तक द्वारा प्रयुक्त खड्गास्त्र से गणेश के खगास्त्र का निवारण, वज्रास्त्र से खड्गास्त्र का निवारण ), २.९३.१२ ( गणेश द्वारा उष्ट्र रूप धारी खड्ग असुर का वध ), नारद १.६६.९२( खड्गी विष्णु की शक्ति सत्या का उल्लेख ), १.६६.११८( खड्गीश की शक्ति वारुणी का उल्लेख ), १.६६.१३५( खड्गी गणेश की शक्ति दुर्भगा का उल्लेख ), स्कन्द २.१.६.६४( भक्त हेतु हृदय में खड्ग धारण का निर्देश ), कथासरित् १८.४.९६( राजा द्वारा सूकर के कण्ठ व गज के पृष्ठ का स्पर्श करने से उनका खड्ग व चर्म बनना ); द्र. खङ्ग khadga

 

खणि स्कन्द १.२.६२.२९( क्षेत्रपालों के ६४ प्रकारों में से एक )

 

खण्ड पद्म ६.१४४.११ ( वृषतीर्थ उपनाम युक्त खण्ड तीर्थ का माहात्म्य : खण्ड तीर्थ के अन्तर्गत खण्ड हृद में स्नान से शिव के शाप से ग्रस्त गायों को गोलोक प्राप्ति ), भविष्य ४.७९ ( खण्ड व्रतों के दोष निवारण हेतु अखण्ड द्वादशी व्रत के विधान का वर्णन ), वायु ६७.७८ ( प्रह्लाद - पुत्र जम्भ के ४ पुत्रों में से एक ), शिव ५.३४.५४ ( खण्डक : तृतीय सावर्णि मनु के ९ पौत्रों में से एक ), स्कन्द २.२.२८.४०( सब दुःखों के खण्डन व अखण्ड आनन्दन की प्राप्ति का उल्लेख ), ५.१.६८.३२ (महाकालवन में अखण्ड सर तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य ), ५.२.३१ ( खण्डेश्वर लिङ्ग के माहात्म्य का वर्णन : भद्राश्व द्वारा खण्डित व्रत की पूर्णता हेतु स्थापना ), ७.१.३३३.७( खण्डघट स्थान पर पिङ्गेश्वर देव की स्थिति का कथन ), द्र. शशिखण्ड । khanda

 

खण्डवटक कथासरित् १८.५.६३ ( राजा विक्रमादित्य द्वारा कार्पटिक कृष्णशक्ति को खण्डवटक ग्राम प्रदान करने का कथन ) ।

 

खदिर नारद १.५६.२०५ ( इन्दुभ / मृगशिरा नक्षत्र में खदिर वृक्ष की उत्पत्ति का उल्लेख ), पद्म १.२८.२७ ( आरोग्यता हेतु खदिर वृक्षारोपण का उल्लेख ), भविष्य ११९३.८ ( दन्तकाष्ठ वर्णन में खदिर वृक्ष से संचय का उल्लेख ), वराह १५३.४२ ( मथुरा माहात्म्य के अन्तर्गत १२ वनों में खदिर वन का उल्लेख ), वामन १७.५ ( ब्रह्मा के शरीर के मध्य भाग से खदिर वृक्ष की उत्पत्ति का उल्लेख ), स्कन्द ५.१६०.५८ ( खदिर से मन्मथ की प्रसन्नता का उल्लेख ), ६.२५२.३६( चातुर्मास में भूमिपुत्र/मङ्गल की खदिर वृक्ष में स्थिति का उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण १.४४१.९० ( मङ्गल देवता के खदिर वृक्ष रूप में अवतरण का उल्लेख ), २.२७.१०१ ( ब्रह्मा के मध्य भाग से खदिर की उत्पत्ति का उल्लेख ) । khadira

 

खद्योत गरुड २.२.७८(वन दाहक के खद्योत बनने का उल्लेख), २.४६.१५(कक्षदाहक के खद्योत बनने का उल्लेख),  ब्रह्माण्ड १.२.२४.९ ( आविर्भाव की इच्छा से स्वयम्भू भगवान् के खद्योतवत् विचरण का उल्लेख ), १.२.३२.७८ ( अन्धकार में खद्योत के सहसा दृष्टिगोचर होने के समान अव्यक्त में महत्तत्व के विवर्त का कथन ), भागवत ४.२५.४७, ४.२९.१० ( शरीर रूपी नगरी के ९ द्वारों में से पूर्व दिशा के खद्योता और आविर्मुखी नामक दो चक्षु - रूप द्वारों द्वारा जीव रूप राजा पुरञ्जन के रूप रूपी विभ्राजित नामक देश में गमन का कथन ), स्कन्द ५.३.१५९.१५ ( कक्ष दाह से खद्योत योनि प्राप्त होने का उल्लेख ), कथासरित् १०.४.२०५ ( वानरों का खद्योत को अग्नि समझकर उससे शरीर तापने का कथन ) । khadyota

 

खनन विष्णुधर्मोत्तर २.१०९(विभिन्न प्रकार की आथर्वण मणियों के खनन व मन्त्र सहित बन्धन की विधि ), लक्ष्मीनारायण ३.२१८ (  मौक्तिकेशी नाम अङ्गार खनिक की ईश भक्ति, ईश्वर द्वारा भक्त के परीक्षण व मोक्षण का वृत्तान्त ) ; द्र. घोरखनक ।

 

खनिज लक्ष्मीनारायण २.१८.४३( खनिजन्य पितृकन्याओं द्वारा कृष्ण को धातुओं से उत्पन्न विविध द्रव आदि समर्पित करने का उल्लेख ), २.२२५.७३(८४ खनिजों का उल्लेख), khanija

 

खनित्र भागवत ९.२.२४ ( प्रमति - पुत्र, चाक्षुष - पिता, दिष्ट वंश ), मार्कण्डेय ११७.१०,११८( प्रजाति के ५ पुत्रों में से एक, खनित्र के चरित्र का वर्णन ), वायु ८६.५ ( प्रजानि - पुत्र, क्षुप - पिता, वैवस्वत मनु वंश ), विष्णु ४.१.२४ ( प्रजापति - पुत्र, चक्षुष - पिता, वैवस्वत मनु वंश ) । khanitra

 

खनिनेत्र भागवत ९.२.२५ ( रम्भ - पुत्र, करन्धम - पिता, दिष्ट वंश ), मार्कण्डेय १२० ( विविंश - पुत्र, क्षुप - पौत्र, पुत्र प्राप्ति की कामना से मृग वध हेतु वन में जाने पर अपुत्रवान् तथा पुत्रवान् मृगों से खनीनेत्र का संवाद ), वायु ८६.७ ( विविंश - पुत्र, करन्धम - पिता, वैवस्वत मनु वंश ), विष्णु ४.१.२८ ( विविंश - पुत्र, अतिविभूति - पिता, वैवस्वत मनु वंश ) । khaninetra

 

खर गणेश २.१४.१३ ( खर रूप धारी काम व क्रोध राक्षसों का महोत्कट गणेश द्वारा वध ), गरुड १.२२५.२३ ( अशस्त्र पुरुष का हरण करने से खर योनि की प्राप्ति का उल्लेख ), देवीभागवत ४.२२.४४ ( खर नामक असुर के धेनुकासुर रूप में अवतरण का उल्लेख ), ब्रह्माण्ड १.२.२७.१७ ( विकृत रूप धारी शिव द्वारा खर तुल्य गायन से क्रुद्ध मुनियों द्वारा खर होने का शाप ), २.३.६.३३ ( विजर के दो पुत्रों में से एक, दनु वंश ), २.३.८.५५ ( विश्रवा व पुष्पोत्कटा के ४ पुत्रों में से एक, पुलस्त्य वंश ), भविष्य ४.९४.६४ ( अनन्त भगवान् के दर्शनार्थ कौण्डिन्य ब्राह्मण द्वारा मार्ग में देखे गए खर / गर्दभ के क्रोध रूप होने का उल्लेख ), भागवत २.७.३४ ( श्रीकृष्ण द्वारा प्रलम्ब, खर प्रभृति राक्षसों के वध का उल्लेख ), ९.१०.९ ( राम द्वारा शूर्पणखा के खर तथा दूषण प्रभृति १४००० भाइयों के वध का उल्लेख ), मत्स्य ६.३३ ( ताम्रा व कश्यप की ६ कन्याओं में से एक सुग्रीवी से अज, अश्व, मेष, उष्ट्र तथा खरों की उत्पत्ति का उल्लेख ), १४८.४६ ( दैत्य सेनानायक कुजम्भ के ध्वज पर विधूत लाङ्गूल खर के अङ्कित होने का उल्लेख ), १७३.१३ ( तारकासुर के दिव्य रथ के सहस्र खरों से युक्त होने का उल्लेख ), १७३.१७, १७७.७ ( तारकामय सङ्ग्राम का एक दैत्य ), मार्कण्डेय १५.१ ( दुष्कर्म फलस्वरूप खर योनि प्राप्ति का उल्लेख ), १५.१८ ( अशस्त्र पुरुष की हत्या पर खर योनि प्राप्ति का उल्लेख ), वा.रामायण ३.१९ ( शूर्पणखा - भ्राता, शूर्पणखा की दुर्दशा देखकर क्रोधित खर द्वारा राम वध हेतु राक्षसों के प्रेषण का वृत्तान्त ), ३.२८, २९, ३० ( खर के राम से युद्ध तथा मृत्यु प्राप्ति का वृत्तान्त ), ३.४२.७ ( रावण द्वारा मारीच को खर युक्त रथ में आसीन होने का निर्देश ), ६.७८.२ ( रावण की आज्ञा से राम - लक्ष्मण वध हेतु खर - पुत्र मकराक्ष के युद्ध हेतु प्रस्थान का वर्णन ), वायु ५०.२७ ( तृतीय पीतभौम नामक तल में खर प्रभृति राक्षसों के निवास का उल्लेख ), ७०.४९ /२.९.४९ ( पुष्पोत्कटा व विश्रवा के चार पुत्रों में से एक, रावण - भ्राता ), ९९.४०६ ( कलियुग में प्रजा द्वारा अजा, खर, उष्ट्र आदि पशुओं के पालन का उल्लेख ), स्कन्द १.२.६२.२८( क्षेत्रपालों के ६४ प्रकारों में से एक ), ५.३.१५९.१४ ( बहुयाजी को खर योनि प्राप्त होने का उल्लेख ), हरिवंश १.५४.७५ ( खर नामक दैत्य के ही धेनुक नामक दैत्य के रूप में उत्पन्न होकर तालवन में विचरने का उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण १.५६१.२५ ( ब्राह्मणों के शाप से राजा हिरण्यबाहु का खर राक्षस बनना, रेवा -  चरु संगम तीर्थ में स्नान से मोक्ष प्राप्ति ), २.८६.४१( विश्रवा व पुष्पोत्कटा के पुत्रों में से एक ), २.८७.२ ( विश्रवा - पुत्र, अधर्मजीव - पिता ), २.२४८.३३  (सोमयाग के संदर्भ में खरों / अग्निकुंडों में विभिन्न देवताओं के ग्रहों को रखने के उल्लेख ), ३.२२५.१४ (नरसिंह स्वामी साधु द्वारा खर पालक आदि को कृष्ण भक्ति का उपदेश ; खर की नारायण से रहित नर से उपमा), ३.२२५.१८ ( खर रूपी मनुष्यों के गुणों का वर्णन, खर शब्द की निरुक्ति ), कथासरित् १०.७.१३० ( वानर द्वारा शिशुमार / नाग को सुनाई गई कर्ण व हृदय से हीन खर की कथा ), १२.५.२०७ ( ब्राह्मणी की लाठी से मार खाकर भागे हुए खर के भग्न - खुर होने का उल्लेख ) । khara

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