The story of Vaalmeeki Raamaayana mentions Krauncha/curlew/heron in plural form, while the only mantra of  Yajurveda refers ‘Krung/curlew’ in singular form only. This anomaly is solved on the basis of bifurcation of singular form into plural in sacrificial literature. The only mantra mentions extraction of milk out of water and drinking it by a sage. This process can be extended further and Soma can be extracted from water by a swan. Sacrificial books inform that this process of extraction refers to transition from one day’s ritual to second day’s ritual in sacrifice. Rather, it will be correct to say that one has to extract second day from the first day itself. Whatever could not be performed on the first day, has to be completed on the second day.

            There are 7 saama songs which are sung on different occasions in sacrifices. These 7 are based on different mantras. It is yet to be investigated whether these have been symbolized by 7 sons of the ruler of Krauncha continent.

            There are few occasions in sacrificial days where the Krauncha song is birfurcated into two. Rather, it will be correct to say that the same song is sung in two ways. One is for perfection of inner voice and the other is for getting relief. These two kinds may have been exploited by sage Vaalmeeki to fabricate the web of Raamaayana. One is connected with inner development at individual level while the other is connected with collective development, as point out by Dr. L.N.Dhoot. It is noteworthy that most of the puraanic books, like Raamaayana, contain 7 chapters, out of which generally first 6 remain connected with slaying of a demon, such as Raavana, while the 7 th chapter is connected with later developments. Historians are often misled by assuming that the 7th chapter is a creation of later period. But, as pointed out by Dr. Fatah Singh, the first 6 chapters symbolize the inner development while the 7th chapter symbolizes collective development. In sacrificial rituals, first 6 days are connected with slaying of demon, while later days are days of joy, spread of joy, collective development. According to Dr. Fatah Singh, these later days are abridged into one chapter in puraanic texts.

            Krauncha is the base of gods. It is not to be killed. It is to be regulated only.

            It will be worthwhile to understand the story of slaying of one Krauncha by a Nishaada/low caste on the basis of seven notes in music. In Indian music, the fourth note is called the medium one. The reason is that it’s voice starts from naval and spreads  in thighs on the lower side, while in heart and chest on the upper side. In esoteric sense, it may be taken as arousing the lower and higher consciousness. It has been stated that a Kraunch/curlew bird sings in this note. On the other hand, the seventh note is called Nishaada, which literally means which can subdue all other notes. The origin of this note has been stated to be from all joints. As has already been said in the comments on word Uushmaa, the generation of heat in our body is due to combination of certain chemicals. This combination can also be classified into the category of joints. Therefore, the story may mean that whatever energy was to be distributed to higher consciousness from the 4th note, that gets limited due to the seventh note. It is noteworthy that the Nishaada of Vaalmeeki Raamaayana kills he - bird, not she - bird.

            In puraanic literature, the residents of Krauncha continent have been universall stated to be worshipping lord Varuna who is the diety of water. And the first king of Krauncha continent has been named after butter. The property of Krauncha continent has been stated that it surrounds the ocean of butter and is itself surrounded by the ocean of milk. This indicates that the first stage in penances is the state of butter where all the molecules are almost symmetric, free from any polarization. On the other hand, taste is generated from water. Water molecules are polarized. This is the second stage of penances. Therefore, the aim is to somehow generate taste out of water. This may be a state of bliss.

    There is a puraanic story that the mouse, the carrier of lord Ganesha, was a Gandharva named Krauncha in his previous birth. When he forcibly tried to enjoy sex on this earth, he became a mouse on the earth. Kaartikeya, the elder brother of Ganesh, lives on Krauncha mountain. Thus, in a way, Krauncha is the seat of both of them. But the qualities of the two are different. One is self - centric while the other is broad - based.

            There is mention of the location of Krauncha continent in the veins in the body. This statement is important to understand the vedic manta. Veins carry the blood in the whole body and body absorbs important elements from it. This is a form of what the mantra indicates – extracting milk from water. One has to investigate how the generation of heat can obstruct this absorption.

First published : 27th September, 2007(Bhaadrapada Puurnimaa, Vikrami Samvat 2063)

क्रौञ्च का वैदिक स्वरूप

-      विपिन कुमार

वाल्मीकि ऋषि ने जिस प्रकार से क्रौञ्च मिथुन की कल्पना की है, वह कल्पना वैदिक साहित्य के क्रौञ्च को समझने के लिए एक कुञ्जी प्रदान करती है। इसका अर्थ यह हुआ कि वैदिक ग्रन्थों में जहां-जहां क्रौञ्च का उल्लेख है, वह दो प्रकार का हो सकता है - स्त्री या प्रकृति रूप और पुरुष रूप। जैमिनीय ब्राह्मण 3.32 तथा 3.147 में जहां क्रुंङ् आंगिरस शब्द प्रकट हुआ है, वहां उसका एक पाठभेद क्रन्दद् आंगिरस भी दिया हुआ है। यह पाठभेद क्रौञ्च की प्रकृति के विषय में आंख खोलने वाला है। क्रौञ्च से पहली स्थिति क्रन्दन की, रोने की, हाहाकार की है। यह स्थिति तब तक रहती है जब तक हमारे पापों का नाश नहीं हो जाता।  दस दिवसीय सोमयाग(दशरात्र) में पापों का नाश छठें दिन जाकर पूरा होता है, वैसे ही जैसे रामायण आदि में रावण का वध छठें काण्ड में होता है। छठें दिन से ही वास्तविक क्रौञ्च पक्षी का, उडने वाले सुपर्ण का, क्रुंङ् आंगिरस का आविर्भाव होता है(जैमिनीय ब्राह्मण 3.147)। दशरात्र सोमयाग के दूसरे दिन आर्भव पवमान या तृतीय सवन में विनियुक्त क्रौञ्च साम का आधार निम्नलिखित ऋचाएं हैं(जैमिनीय ब्राह्मण 3.31)-

अयं पूषा रयिर्भग: सोम: पुनानो अर्षति

 पतिर्विश्वस्य भूमनो व्यख्यद्रोदसी उभे ।।

समु प्रिया अनूषत गावो मदाय घृष्वयः

सोमास: कृण्वते पथ: पवमानास इन्दव: ।।

ओजिष्ठस्तमा भर पवमान श्रवाय्यम्

यः पञ्च चर्षणीरभि रयिं येन वनामहे ।।

     दशरात्र सोमयाग के छठें दिन आर्भव पवमान में विनियुक्त क्रौञ्च साम का आधार निम्नलिखित तृच है-

इन्द्रायेन्दो मरुत्वते पवस्व मधुमत्तमः। अर्कस्य योनिमासदम्।।

तन्त्वा विप्रा वचोविदः परिष्कृण्वन्ति धर्णसिम्। सन्त्वा मृजन्त्यायवः।।

रसन्ते मित्रो अर्यमा पिबन्तु वरुणः कवे। पवमानस्य मरुतः।।

ताण्ड्य ब्राह्मण 13.9.17 में छठें दिन के इस प्रसंग को एक रूपक द्वारा समझाया गया है कि रेवती नामक गाएं हैं जिनका दोहन करना है। उनके लिए इषोवृधीयं साम मेथी(खूंटा) बनता है, क्रौञ्च साम रज्जु और वाजदावर्य्य साम वत्स। इन तीनों सामों की तृचा एक ही है, विस्तार में अन्तर है।

     इससे आगे दशरात्र सोमयाग के 8वें दिन आर्भव पवमान में जिस क्रौञ्च साम का विनियोग होता है, उसकी तृच निम्नलिखित है(ताण्ड्य ब्राह्मण 14.11.29, जैमिनीय ब्राह्मण 3.229)-

अभी नो वाजसातमं रयिमर्ष शतस्पृहम्।

इन्दो सहस्रभर्णसन्तुविद्युम्नं विभासहम्।।

वयन्ते अस्य राधसो वसोर्वसो पुरुस्पृहः।

नि नेदिष्ठतमा इषस्याम सुम्ने ते अध्रिगो।।

परि स्य स्वानो अक्षरदिन्दुरव्ये मदच्युतः।

धारा य ऊर्ध्वो अध्वरे भ्राजा न याति गव्ययुः।।

     कहा गया है कि इस साम की विशेषता यह है कि यह मध्य में स्वारं प्रकार का है और स्वारं प्राण का प्रतिनिधि है।

          इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सोमयाग के तीन दिवसों पर प्रयुक्त होने क्रौञ्च सामों के रूप में हमें क्रौञ्च के तीन रूप प्राप्त हो रहे हैं शुद्ध प्रकृति रूप, मिथुन रूप और शुद्ध पुरुष रूप।

    

लेखन 13-6-2011 ई.(ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी, विक्रम संवत् 2068)

क्रौञ्च का वैदिक स्वरूप

 - विपिन कुमार

वाल्मीकि ने जिस क्रौञ्च मिथुन पक्षी की कल्पना की है, वैदिक साहित्य में प्रत्यक्ष रूप में उस मिथुन का उल्लेख नहीं है । वेद में तो क्रौञ्च के संदर्भ में एकमात्र मन्त्र '

अद्भ्यः क्षीरं व्यपिबत् क्रुङ्ङाङ्गिरसो धिया ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु ।। - ( वाजसनेयि माध्यन्दिन संहिता १९.७३)'

 प्रकट होता है जिसमें क्रुङ् एकवचन में ही है लेकिन याज्ञिक कर्मकाण्ड में सामवेदीय विधियों से क्रौञ्च मिथुन का रहस्योद्घाटन होता है

          जैमिनीय ब्राह्मण .३२ का कथन है कि वैदिक मन्त्र में जो 'अद्भ्य: क्षीरं व्यपिबत् क्रुङ् आङ्गिरसो धिया' इति उल्लेख है, उसमें आपः से क्षीर पान का अर्थ याज्ञिक भाषा में एक यज्ञीय अह से दूसरे यज्ञीय अह का निर्माण करना है यज्ञ में एक अह से दूसरे अह को संक्रमण स्वयमेव नहीं हो जाता जब एक अह के कृत्यों द्वारा किसी तत्त्व का शोधन अपूर्ण रह जाता है, तभी दूसरे, उन्नत प्रकार के अह को संक्रमण किया जाता है

          सामवेद में त्रिचों पर आधारित सात साम ऐसे हैं जिन्हें क्रौञ्च साम के नाम से पुकारा जाता है ( यह अन्वेषणीय है कि क्या इसी आधार पर पुराणों में क्रौञ्च द्वीप के अधिपति घृतपृष्ठ के पुत्रों में द्वीप का विभाजन दिखाया गया है ? ) इन क्रौञ्च सामों का प्रयोग अलग - अलग यज्ञों में किया जाता है सबसे पहले दशरात्र नामक सोमयाग का उदाहरण लेते हैं दस दिवसीय इस याग के दूसरे अह में आर्भव पवमान नामक तृतीय सवन में जिस तृचा का प्रयोग होता है, वह इस प्रकार है :

 'अयं पूषा रयिर्भग: सोम: पुनानो अर्षति पतिर्विश्वस्य भूमनो व्यख्यद्रोदसी उभे ।।

समु प्रिया अनूषत गावो मदाय घृष्वयः सोमास: कृण्वते पथ: पवमानास इन्दव: ।।

ओजिष्ठस्तमा भर पवमान श्रवाय्यम् यः पञ्च चर्षणीरभि रयिं येन वनामहे ।।

          क्रौञ्च साम के प्रयोग का दूसरा उदाहरण दशरात्र सोमयाग के छठे दिन का आर्भव पवमान है इस क्रौञ्च साम की तृचा योनि निम्नलिखित है (ताण्ड्य ब्राह्मण १३..११) :

इन्द्रायेन्दो मरुत्वते पवस्व मधुमत्तम: अर्कस्य योनिमासदम् ।।

तन्त्वा विप्रा वचोविद: परिष्कृण्वन्ति धर्णसिम् सन्त्वा सृजन्त्यायव: ।।

रसन्ते मित्रो अर्यमा पिबन्तु वरुण: कवे पवमानस्य मरुतः ।।

जैमिनीय ब्राह्मण .१४७ .१६४ के आधार पर ऐसा कहा जा सकता है कि इस साम के दो प्रकार हैं - उद्वत् और शाम्मद उद्वत् प्रकार से देवों ने स्वर्ग लोक को ऊर्ध्व गमन किया जबकि शाम्मद प्रकार से लोकों को पुनः प्राप्त किया तृच की प्रथम ऋक् में अर्क शब्द का उल्लेख है और तीसरी ऋक् में मित्र, वरुण और अर्यमा देवों का उल्लेख है यह कहा जा सकता है कि यह एक प्रकार से वैदिक अर्क - अश्वमेध का रूप है जहां अर्क एकान्तिक साधना से और अश्वमेध सार्वत्रिक साधना से सम्बन्धित है यह उल्लेखनीय है कि महाभारत युद्ध के दूसरे दिन कौरव और पाण्डव दोनों अपनी सेनाओं के लिए क्रौञ्च व्यूहों का निर्माण करते हैं जबकि छठे दिन पाण्डव अपनी सेनाओं हेतु क्रौञ्च व्यूह का निर्माण करते हैं और कौरव शकट व्यूह का ।

           दशरात्र याग के अष्टम अह को द्वितीय छन्दोम कहा जाता है इस अह में भी आर्भव पवमान कृत्य में क्रौञ्च साम का प्रयोग करने का निर्देश है( ताण्ड्य ब्राह्मण १४.११.२९) इस क्रौञ्च साम की त्रिच निम्नलिखित है :

अभी नो वाजसातमं रयिमर्ष शतस्पृहम् इन्दो सहस्रभर्णसन्तुविद्युम्नं विभासहम् ।।

वयन्ते अस्य राधसो वसोर्वसो पुरुस्पृहः नि नेदिष्ठतमा इषस्याम सुम्ने ते अध्रिगो ।।

परि स्य स्वानो अक्षरदिन्दुरव्ये मदच्युतः धारा ऊर्ध्वो अध्वरे भ्राजा याति गव्ययु: ।।

कहा गया है कि इस अह के क्रौञ्च साम की प्रकृति वैसी ही है जैसे द्वितीय अह की

           पहले दिनों की संज्ञा पृष्ठ्य षडह होती है और उसके पश्चात् के तीन अहों की संज्ञा छन्दोम होती है ऐसा अनुमान है कि पहले दिनों में वृत्र का वध किया जाता है और फिर छन्दोम संज्ञक तीन अह आनन्द के हैं

 इसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिए वाल्मीकि द्वारा रामायण की रचना की गई है डा. फतहसिंह के अनुसार पौराणिक ग्रन्थों में प्रायः काण्ड मिलते हैं जिनमें से अन्तिम काण्ड को उत्तरकाण्ड कहा जाता है प्रायः इतिहासकारों द्वारा ऐसा मान लिया जाता है कि उत्तरकाण्ड का अर्थ है कि यह काण्ड मूल ग्रन्थ में नहीं था, इसकी रचना परवर्ती काल में की गई लेकिन वास्तविकता यह है कि पहले काण्ड वृत्र वध से, रावण के वध से सम्बन्धित होते हैं जबकि उत्तरकाण्ड में शेष सभी अहों का समावेश कर लिया जाता है काशकृत्स्न धातु कोश में क्रुञ्च धातु कौटिल्ये अल्पीभावे अर्थ में दी गई है इसका अर्थ यह हो सकता है कि क्रौञ्च के केवल एक प्रकार में अल्पीभाव विद्यमान रहेगा जब क्रौञ्च का मिथुन रूप रहेगा, वही पूर्ण रूप होगा यदि कोई केवल ऊर्ध्वमुखी एकान्तिक साधना का अनुसरण करेगा, वह भी अपूर्ण होगा और केवल सार्वत्रिक साधना भी अपूर्ण होगी

          क्रौञ्च साम के प्रयोग का अन्य उदाहरण गवामयन नामक सोमयाग है इस याग में अहों का क्रम इस प्रकार है कि एक मास में पहले २४ दिनों में - दिनों के अभिप्लव षडहों का अनुष्ठान किया जाता है और फिर इनके अन्त में दिन के एक पृष्ठ~य षडह का अनुष्ठान किया जाता है यह क्रम मास इसी प्रकार चलता है फिर क्रम में परिवर्तन होते हैं कहा जाता है कि अभिप्लव नामक कृत्य देवों की त्वरित गति से प्रगति के लिए होता है जबकि पृष्ठ्य षडह अंगिरस संज्ञक प्राणों की मन्द गति से प्रगति के लिए होता है अभिप्लव षडह के छठे दिन आर्भव पवमान कृत्य में निम्नलिखित तृच योनि वाले क्रौञ्च साम के अनुष्ठान का निर्देश है ( ) :

सोमा: पवन्ते इन्दवो ऽस्मभ्यं गातुवित्तमा: मित्रा स्वाना अरेपसस्वाध्यस्वर्विद: ।।

ते पूतासो विपश्चितस्सोमासो दध्याशिर: सूरासो दर्शतासो जिगत्नवो ध्रुवा धृते ।।

सुष्वाणासो व्यद्रिभिश्चिताना गोरधि त्वचि इषमस्मभ्यमभितस्समस्वरन्वसुविद: ।।

इसी तृच का प्रयोग पृष्ठ्य षडह के छठे दिन के  आर्भव पवमान कृत्य में भी करने का निर्देश है लेकिन इस पृष्ठ्य षडह में इसी तृच पर आधारित दो अलग - अलग निधनों वाले सामों का प्रयोग किया जाता है एक साम में वा निधन है तथा दूसरे में इडा निधन है यह तथ्य क्रौञ्च मिथुन का एक और उदाहरण हो सकता है वा निधन का अर्थ है - वाक् यह पुराणों की कथाओं में बाणासुर के क्रौञ्च पर्वत में प्रवेश करने और कार्तिकेय द्वारा उसका वध करने की व्याख्या कर सकता है क्योंकि बाणासुर में बाण शब्द भी वाण - वाक्, वीणा का संकेत करता है

          वाल्मीकि रामायण के निषाद और क्रौञ्च प्रसंग को संगीत के स्वरों के आधार पर भी समझने की आवश्यकता है नारद पुराण .५० के अनुसार क्रौञ्च पक्षी लौकिक वीणा के मध्यम स्वर में शब्द करता है जो दैवी वीणा में प्रथम स्वर बनता है मध्यम स्वर की उत्पत्ति नाभि/उर से होती है और इसका विस्तार नीचे ऊरु और ऊपर उर हृदय में होता है अतः इसे मध्यम स्वर कहा जाता है इसका निहितार्थ यह हो सकता है कि यह स्वर ऊर्ध्वमुखी चेतना और अधोमुखी चेतना, दोनों को ऊर्जा प्रदान करता है दूसरी ओर, निषाद स्वर की उत्पत्ति सर्व सन्धियों में/से होती है और चूंकि इस स्वर की उत्पत्ति से अन्य स्वर पराभूत हो जाते हैं, बैठ जाते हैं, अतः इसे निषाद ( नि:शेषेण सीदति इति ) कहते हैं जैसा कि ऊष्मा शब्द की टिप्पणी में कहा जा चुका है, हमारे शरीर में जो रासायनिक क्रियाएं घटित होती हैं, उनमें ऊष्मा का जनन होता है इस ऊष्मा का कुछ भाग तो हमारे शरीर की क्रियाओं को चलाने में, यान्त्रिक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है और शेष ऊष्मा के रूप में व्यर्थ चला जाता है(यह उल्लेखनीय है कि निषाद स्वर का देवता आदित्य है अतः जो ऊष्मा उत्पन्न हो रही है, उसका सत्य रूप यह है कि वह तेज की, आदित्य की वृद्धि करे ) आधुनिक विज्ञान के माध्यम से हम यह जानते हैं कि रासायनिक क्रियाएं भी सन्धियों का एक प्रकार है अतः इन्हें भी निषाद स्वर की श्रेणी में वर्गीकृत किया जा सकता है वाल्मीकि रामायण के कथन से ऐसा प्रतीत होता है कि यदि निषाद स्वर में ऊर्जा का व्यय होगा तो मध्यम स्वर की अभिव्यक्ति नाभि के केवल एक ओर ही हो पाएगी सन्धि के संदर्भ में दूसरा संकेत महाभारत आश्वमेधिक पर्व २४ से प्राप्त होता है जहां कहा गया है कि मैथुन आदि में जो हर्ष उत्पन्न होता है, वह उदान वायु का रूप है और उदान वायु समान और व्यान की सन्धि से उत्पन्न होती है अतः क्षुद्र स्तर के हर्ष भी निषाद की श्रेणी में आते हैं

          गरुड पुराण आदि में क्रौञ्च द्वीप की स्थिति शिराओं में कही गई है हमारे शरीर में शिराओं के माध्यम से रक्त आदि का प्रवाह होता है जिसमें से शरीर के भाग रसों का अवशोषण कर लेते हैं और शरीर को पुष्ट करते हैं पुराणों का यह कथन कि क्रौञ्च द्वीप की स्थिति शिराओं में है, यजुर्वेद के मन्त्र 'अद्भ्य: क्षीरं व्यपिबत् क्रुङ्ङाङ्गिरसो धिया' को समझने में सहायता करता है इससे अगला मन्त्र है - 'सोममद्भ्य: व्यपिबत् छन्दसा हंस: शुचिषद्' इत्यादि रसों के अवशोषण में निषाद स्वर, ऊष्मा आदि का जनन किस प्रकार विघ्न डालता है, यह अन्वेषणीय है यह उल्लेखनीय है कि वैदिक साहित्य में 'शिरा' शब्द प्रकट नहीं होता, अपितु शिला शब्द प्रकट होता है भूमि के जिस सीमित भाग में खनिज पदार्थ फैले हुए होते हैं, अंग्रेजी भाषा में उन्हें वीन्स, शिराएं कहा जाता है पैप्पलाद संहिता के एक सूक्त में कामना की गई है कि जो शिलाएं अरस हो गई हैं, उनका भूमि पर पतन हो जाए शिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि उनके रस का विस्तार हो

          गणेश पुराण में क्रौञ्च गन्धर्व के मूषक बन जाने की कथा भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि कहा जाता है कि मूषक पृथिवी के रस को जानता है लेकिन साथ ही साथ मूषक शब्द में मुष् धातु चोरी के अर्थ में है अतः मूषक जिस रस का ग्रहण करता है, वह चोरी है उसने उस रस को उत्पन्न करने के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया है हम सबकी भी यही स्थिति है हम रसों के अनधिकारी होते हुए भी उनकी प्रकृति से चोरी कर रहे हैं अपने प्रयत्न से हमने रस उत्पन्न नहीं किए हैं और गणेश पुराण में गजानन गणेश मूषक पर नियन्त्रण करने के लिए उसको अपना वाहन बना लेते हैं निषाद स्वर हस्ती का स्वर है अतः इस कथा में यह महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि निषाद हस्ती द्वारा क्रौञ्च रूप मूषक का नियन्त्रण किया जा रहा है दूसरे शब्दों में क्रौञ्च रूप मूषक हस्ती रूप निषाद की प्रतिष्ठा है जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण के श्लोक में किया जा रहा है - मा निषाद प्रतिष्ठां इत्यादि यह महत्त्वपूर्ण है कि पुराणों में क्रौञ्च को प्रतिष्ठा के रूप में ही प्रदर्शित किया गया है स्कन्द कार्तिकेय की भी प्रतिष्ठा क्रौञ्च पर्वत ही है अतः साधना में क्रौञ्च रूप को मारना नहीं है, उसके ऊपर गणेश की भांति नियन्त्रण करना है (यह उल्लेखनीय है कि वाल्मीकि रामायण में निषाद ने पुरुष क्रौञ्च की हत्या की है, स्त्री क्रौञ्च की नहीं) गणेश पुराण की कथा में क्रौञ्च गन्धर्व मूषक क्यों बना, यह भी जानना महत्त्वपूर्ण है क्रौञ्च गन्धर्व सौभरि ऋषि की पत्नी मनोमयी पर आकृष्ट हो गया और उसके साथ बलात्कार करना चाहा जिस पर ऋषि ने उसको मूषक बनने का शाप दे दिया क्योंकि मूषक भी चोरी करता है, वह भी चोरी कर रहा था गन्धर्व की निरुक्ति गं - धारयति, जो ज्ञान को धारण करता है, के रूप में की जा सकती है लेकिन क्रौञ्च गन्धर्व अपने ज्ञान की उपेक्षा कर मनोमयी प्रकृति पर आकृष्ट हो रहा है ऐसा प्रतीत होता है कि गणेश का क्रौञ्च रूपी वाहन मूषक धातु कोश के अर्थ क्रुञ्च - कौटिल्याल्पीभावे को चरितार्थ कर रहा है जबकि स्कन्द की प्रतिष्ठा क्रौञ्च पर्वत में क्रौञ्च का बृहद् रूप प्रकाशित होता है गणेश एकान्तिक साधना का और स्कन्द बृहत् साधना का प्रतीक हैं स्कन्द सारी पृथिवी की परिक्रमा करते हैं स्कन्द को हमारे व्यक्तित्व के, हमारी चेतना के सात स्कन्ध, सात कोश कहा जा सकता है जैमिनीय आरण्यक १६..१२ में उल्लेख आता है कि बृहस्पति ने ब्रह्मवर्चस प्राप्ति के लिए सामों में से क्रौञ्च साम का वरण किया बृहस्पति भी बृहती - पति है, बृहत् का रूप है

          पुराणों में क्रौञ्च द्वीप के अधिपति के रूप में प्रियव्रत - पुत्र घृतपृष्ठ का नाम लिया गया है और क्रौञ्च द्वीप के निवासी आपः के देवता वरुण या महादेव की उपासना करते हैं यह भी उल्लेख है ( देवीभागवत पुराण आदि) कि कुश द्वीप के परितः घृत समुद्र है, घृत समुद्र के परितः क्रौञ्च द्वीप, क्रौञ्च द्वीप के परितः क्षीर सागर, क्षीरसागर के परितः शाकद्वीप यह सर्वविदित ही है कि जल में रस अव्यक्त रूप से विद्यमान हैं रस विद्युत का रूप हैं अतः जब कहा जाता है कि क्रौञ्च द्वीप के निवासी आपः रूप वरुण की उपासना करते हैं, तो इसका तात्पर्य यही होगा कि जो रस अव्यक्त रूप में विद्यमान हैं, उनको प्रकट करना और इससे पहली स्थिति घृत की हो सकती है घृत क्या हो सकता है, इस संदर्भ में यह सोचा जा सकता है कि घृत के अणुओं में सर्वाधिक सममिति विद्यमान होती है, वह किसी ध्रुवीकरण से मुक्त होते हैं रसों में यह ध्रुवीकरण व्यक्त हो जाता है अतः साधना की पहली स्थिति ध्रुवीकरण से मुक्त होकर घृत अवस्था प्राप्त करने की है उसके पश्चात् दूसरी स्थिति मधु/आनन्द प्राप्त करने की है जैमिनीय ब्राह्मण .२२५ का कथन है कि घृतश्चुन्निधनं यजु निधन है जबकि मधुश्चुन्निधनं साम निधन है घृत और मधु की स्थितियों से ऐसा भी संकेत लिया जा सकता है कि यह सूर्य और चन्द्रमा की स्थितियां हैं पुराणों में गौरी शिव क्रमशः पूर्णिमा अमावास्या को क्रौञ्च पर्वत पर स्थित स्कन्द कार्तिकेय से मिलने आते हैं, ऐसा उल्लेख मिलता है ऐसा तभी हो सकता है जब क्रौञ्च में चन्द्रमा का समावेश हो गया हो सूर्य, पृथिवी चन्द्रमा के मिलन से ही संवत्सर बनता है

          वाल्मीकि रामायण युद्ध काण्ड ९६.२६ में उल्लेख आता है कि राम ने विराध राक्षस का निग्रह क्रौञ्च वन में किया विराध के संदर्भ में एक वैदिक मन्त्र महत्त्वपूर्ण है : 'सं श्रुतेन गमेमहि मा श्रुतेन विराधिषि ' अर्थात् श्रुत के अनुसार आचरण करे, श्रुत के साध विराध करे विराध क्या होता है, यह अज्ञात है यदि राध कोई आह्लाद की स्थिति है तो विराध उस आह्लाद में उन्मत्त होने की स्थिति हो सकती है महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि क्रौञ्च किसी प्रकार से श्रुत ज्ञान से भी सम्बन्धित है   छान्दोग्य उपनिषद .२२. में उद्गीथ के संदर्भ में क्रौञ्च की भांति गाए जाने वाले उद्गीथ को बृहस्पति देवता का कहा गया है

          आपस्तम्ब श्रौत सूत्र २४.१३ में निर्देश है कि स्वर्गकामी के लिए उच्च स्वर में क्रौञ्च की भांति वषट् करे वषट् के बारे में कहा गया है कि ऊपर का सूर्य ही वौ है और नीचे छह ऋतुएं ही षट् हैं अतः सूर्य को पृथिवी पर अवतरित कराना ही वौषट् है लेकिन यह स्थिति ऊपर से नीचे आने की हुई, जबकि आपस्तम्ब श्रौत सूत्र का निर्देश नीचे से ऊपर जाने के संदर्भ में है

वर्ष नाम

अग्नि 119.14

कूर्म

गरुड 1.56.12

देवीभागवत 8.13.7

ब्रह्माण्ड 1.2.19.71

भागवत 5.20.21

लिङ्ग

विष्णु 2.4.48

कुशल

 

कुशल

आम

कुशल(क्रौञ्च)

आम

 

कुशल

मनोनुग

 

मन्दग

मधुररुह

मनोनुग(वामन)

मधुरुह

 

मल्लग

उष्ण

 

उष्ण

मेघपृष्ठ

उष्ण

मेघपृष्ठ

 

उष्ण

प्रधान

 

पीवर

सुधामक

पीवर

सुधामा

 

पीवर

अन्धकारक

 

अन्धकारक

भ्राजिष्ठ

अन्धकारक

भ्राजिष्ठ

 

अन्धकारक

मुनि

 

मुनि

लोहितार्ण

मुनि

लोहितार्ण

 

मुनि

दुन्दुभि

 

दुन्दुभि

वनस्पति

दुन्दुभिस्वन

वनस्पति

 

दुन्दुभि

 

पर्वत नाम

अग्नि 119.16

कूर्म 1.49.27

गरुड 1.56.13

देवीभागवत 8.13.9

ब्रह्माण्ड 1.2.19.66

भागवत 5.20.21

लिङ्ग 1.53.14

विष्णु 2.4.50

क्रौञ्च

क्रौञ्च

क्रौञ्च

शुक्ल

क्रौञ्च

शुक्ल

क्रौञ्च

क्रौञ्च

वामन

वामन

वामन

वर्धमान

वामनक

वर्धमान

वामनक

वामन

अन्धकारक

अधिकारिक

अन्धकारक

भोजन

अन्धकारक

भोजन

अन्धकारक

अन्धकारक

देवावृत्

देवाब्द/दिवावृत्

 

उपबर्हण

दिवावृत्

उपबर्हिण

दिवावृत्

रत्नशैल/स्वाहिनी

पुण्डरीक

विवेद

दिवावृत्

नन्द

द्विविद

नन्द

विविन्द

दिवावृत्

दुन्दुभि

पुण्डरीक

दुन्दुभि

नन्दन