Puraanic contexts of words like Krishna, Krishnadwaipaayana etc. are given here.

कृष्णकल्प वायु २३.७४ ( महेश्वर के कृष्णवर्ण होने पर कल्प के कृष्णकल्प नाम से प्रथित होने का उल्लेख ) ।

 

कृष्णकुमार भविष्य ३.३.५.१० ( देवपाल व कीर्तिमालिनी के तीन पुत्रों में से एक, पृथ्वीराज - अग्रज, धुन्धुकार - अनुज ), ३.३.६.५० ( कृष्णकुमार द्वारा जयचन्द्र - सेनानी विद्योत के वध का उल्लेख ), ३.३.६.५४ ( जयचन्द्र - अनुज रत्नभानु से युद्ध में कृष्णकुमार की मृत्यु ) ।

 

कृष्णगङ्गा वराह १७५.१ ( अपर नाम यमुना, कालिन्दी; कृष्णगङ्गा के प्रभाव का कथन ) ।

 

कृष्णगिरि ब्रह्माण्ड १.२.१६.२२ ( भारतवर्ष के अनेक पर्वतों में से एक ), वायु ४५.९१ ( वही) ।

 

कृष्णचैतन्य भविष्य ३.४.१९.४, ३.४.२४.५३ - ५५ ( कृष्णचैतन्य के यज्ञांश होने का उल्लेख ) ।

 

कृष्णतीर्थ मत्स्य २२.३८ ( पितर श्राद्ध हेतु कृष्णतीर्थ की प्रशस्तता का उल्लेख ) ।

 

कृष्णतोया वायु ४३.२८ ( भद्राश्व देश की अनेक नदियों में से एक ) ।

 

कृष्णद्वैपायन ब्रह्माण्ड २.३.८.९२ ( काली में पराशर से कृष्ण द्वैपायन की उत्पत्ति तथा अरणि में द्वैपायन से शुक की उत्पत्ति का उल्लेख ), ३.४.४.५० ( कृष्ण द्वैपायनोक्त पुराण के श्रवण से पापमुक्ति तथा पुण्य प्राप्ति का कथन ), भागवत १.४.३२ ( स्वयं को अपूर्ण सा मानकर खिन्न हुए कृष्ण द्वैपायन व्यास के आश्रम पर नारद के आगमन का उल्लेख ), ९.२२.२२ ( शुकदेव का सत्यवती व पराशर से उत्पन्न स्व - पिता कृष्ण द्वैपायन व्यास से भागवत पुराण के अध्ययन का उल्लेख ), १२.४.४१ ( नारायण द्वारा नारद को, नारद द्वारा कृष्णद्वैपायन व्यास को तथा कृष्ण द्वैपायन द्वारा शुकदेव को भागवत पुराण के उपदेश का कथन ), मत्स्य ५०.४६ ( कृष्णद्वैपायन व्यास द्वारा विचित्रवीर्य के क्षेत्र में धृतराष्ट्र तथा पाण्डु को उत्पन्न करने का उल्लेख ), १८५.३० ( महादेव द्वारा पार्वती को कृष्णद्वैपायन व्यास के साक्षात् नारायणत्व तथा क्रोध के हेतु का कथन, शिव -पार्वती का मनुष्य रूप में व्यास को भिक्षा प्रदान करना ), वायु  ७०.८४ ( काली व पराशर के संयोग से कृष्णद्वैपायन की उत्पत्ति, अरणि में द्वैपायन से शुक की उत्पत्ति ), ९९.२४१( शन्तनु - पुत्र विचित्रवीर्य के क्षेत्र / पत्नी में कृष्णद्वैपायन द्वारा धृतराष्ट्र, पाण्डु व विदुर को उत्पन्न करने का उल्लेख ), विष्णु ३.३.१९ ( २८वें द्वापर के वेदव्यास के रूप में कृष्णद्वैपायन का उल्लेख ), ३.४.५ (कृष्णद्वैपायन व्यास के नारायणत्व तथा महाभारत कर्त्तृत्व का उल्लेख ),४.२०.३८ ( कृष्णद्वैपायन द्वारा विचित्रवीर्य के क्षेत्र में धृतराष्ट्र व पाण्डु तथा दासी में विदुर को उत्पन्न करने का उल्लेख ), ६.२.३२ ( कृष्णद्वैपायन व्यास द्वारा मुनियों को कलियुग में धर्म सिद्धि विषयक उपदेश का कथन ) । krishnadvaipaayana/ krishnadwaipaayana

 

कृष्णपक्ष ब्रह्माण्ड ३.४.३२.१५ ( महाकाल के आसनभूत षोडशदल कमल की कला, काष्ठा आदि सोलह शक्तियों में से एक ), वायु ५२.३७ ( शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा के पूर्ण होने पर कृष्णपक्ष में देवों द्वारा चन्द्र - अमृत को पीने का उल्लेख ), ५७.९ ( कृष्णपक्ष पितरों का दिव तथा शुक्लपक्ष पितरों की रात्रि होने का उल्लेख ), ८३.८० ( शुक्लपक्ष के पूर्वाह्न में तथा कृष्णपक्ष के अपराह्न में श्राद्ध सम्पन्न किए जाने का उल्लेख ) ।

 

कृष्णप्रेमामृत ब्रह्माण्ड २.३.३४.५०, ५३ ( मृग द्वारा परशुराम को कृष्णप्रेमामृत स्तोत्र से सफलता मिलने का कथन ), २.३.३६.१०, ४३ ( अगस्त्य द्वारा परशुराम को कृष्णप्रेमामृत स्तोत्र के माहात्म्य का कथन ), २.३.३७.१० ( अगस्त्य के कथनानुसार परशुराम द्वारा कृष्णप्रेमामृत स्तोत्र का स्तवन तथा कृष्ण के साक्षात् दर्शन ) । krishnapremaamrita

 

कृष्णमन्त्र ब्रह्माण्ड २.३.३१.३७ ( कार्य सिद्धि हेतु ब्रह्मा का परशुराम को शिव से कृष्णमन्त्र - प्राप्ति का परामर्श ) 

 

कृष्णमातृका नारद १.६६

 

कृष्णमृग वामन ३५.५१ ( मानुष तीर्थ में स्नान करके बाण पीडित कृष्णमृगों का मनुष्यत्व को प्राप्त होने का कथन ), लक्ष्मीनारायण १.३८०.३९(पतिव्रता मृगी के प्रभाव से दावानल का शान्त होकर कृष्ण मृग बनने का उल्लेख ) ।

 

कृष्णयश लक्ष्मीनारायण ३.१७.८१ ( कृष्णयश नामक विप्र के पुत्र रूप में चतुर्मुख नारायण के प्राकट्य का कथन )

 

कृष्णवेणी पद्म ६.१११.२६ ( कृष्णा और वेण्या नदियों के क्रमश: विष्णु और महेश्वर रूप होने का उल्लेख ), ब्रह्माण्ड १.२.१६.३४ ( सह्य पर्वत से नि:सृत दक्षिण दिक् प्रवाही वेणा नदी की पितर श्राद्ध हेतु प्रशस्तता ), मत्स्य २२.४६ ( पितर श्राद्ध हेतु कृष्णवेणा नदी की प्रशस्तता का उल्लेख ), ५१.१३ ( हव्यवाहन अग्नि द्वारा कृष्णवेणा प्रभृति १६ नदियों के साथ पृथक् - पृथक् विहार का उल्लेख ), ११४.२९ ( सह्य पर्वत से नि:सृत दक्षिणापथ की नदियों में से एक ), १६३.६१ ( हिरण्यकशिपुद्वारा क्षुब्ध तथा प्रकम्पित नदियों , पर्वतों, नगरी में से एक ), वायु २९.१३ ( कृष्णवेणी : हव्यवाहन अग्नि द्वारा कृष्णवेणी प्रभृति १६ नदियों में स्वयं को प्रविभक्त करके १६ धिष्णि पुत्रों की उत्पत्ति का उल्लेख ), १०८.८१( कृष्णवेण्या : मुक्तिदायिनी कृष्णवेण्या नदी में स्नान कर पिण्डदान करने से पितरों को स्वर्ग प्राप्त होने का उल्लेख ), शिव १.१२.१५ ( अष्टादशमुखा कृष्णवेणा नदी का संक्षिप्त माहात्म्य ) । krishnaveni

 

कृष्णव्रत मत्स्य १०१.५८ ( विष्णुलोक प्रापक कृष्णव्रत में स्वर्णनिर्मित विष्णु चक्र के दान का उल्लेख ) ।

 

कृष्णशक्ति कथासरित् १८.५.५२ ( बन्धुओं से तिरस्कृत कृष्णशक्ति नामक राजकुमार का विक्रमादित्य के समीप पहुंचना और कार्पटिक बनना, सेवा से प्रसन्न होकर विक्रमादित्य द्वारा कार्पटिक को खण्डवटक का राज्य प्रदान करने की कथा ) ।

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